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33 साल बाद भी अधर में लटकी कॉलोनी की जमीन, नियमों को ताक पर रखकर शासकीय जमीन की बंदरबांट का आरोप

33 वर्ष बाद भी नहीं हो सकी साडा कॉलोनी की भूमि आवंटन प्रक्रिया समाप्त

चंदेरी/ निर्मल विश्वकर्मा/ खबर डिजिटल/ नगर पालिका चंदेरी में साडा कॉलोनी की वह ज़मीन जो गरीब और गृहविहीनों के लिए वर्ष 1992 में आवंटित की गई थी, आज तक पूरी तरह वितरित नहीं हो सकी है। 33 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद भी इस आवंटन प्रक्रिया का अंत न होना न केवल प्रशासन की लापरवाही दर्शाता है, बल्कि गंभीर अनियमितताओं और शासकीय भूमि की कथित बंदरबांट की ओर भी इशारा करता है।

इतिहास की परतों में दबा घोटाला

वर्ष 1981 में मध्यप्रदेश शासन द्वारा विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण (साडा) का गठन ग्राम फतेहाबाद, रामनगर, प्राणपुर और सराए को मिलाकर किया गया था। तत्कालीन अध्यक्ष स्व. माधवराव सिंधिया के प्रयासों से वर्ष 1992 में स्थानीय गृहविहीन नागरिकों के लिए लगभग 30 बीघा शासकीय भूमि मिश्रित आवास गृह योजना हेतु स्वीकृत की गई। योजना के अंतर्गत एमआईजी, एलआईजी, और ईडब्ल्यूएस वर्गों के लिए भूखंडों का पंजीयन कराया गया।

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हालांकि पंजीयन के बाद भी लाभार्थियों को न तो विधिसम्मत रूप से भूखंड आवंटित किए गए, और न ही संबंधित भूमि का सीमांकन या चिन्हांकन कराया गया। नतीजा यह हुआ कि आज तक यह स्पष्ट नहीं हो सका कि वास्तव में कितने भूखंड किस क्षेत्रफल में उपलब्ध हैं।

1995 के बाद से बदस्तूर जारी है गड़बड़ी

वर्ष 1995 में साडा का नगरपालिका चंदेरी में विलय हुआ। इसके बाद से आज तक, भूखंडों के आवंटन में नियमों की अनदेखी और रिकार्ड्स में हेराफेरी की प्रक्रिया लगातार चलती रही है। चौंकाने वाली बात यह है कि साडा कॉलोनी के आसपास की कीमती शासकीय भूमि को भी फर्जी भूखंड दिखाकर आवंटित किया गया।

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नगर पालिका और तहसील प्रशासन की आपसी मिलीभगत से इन शासकीय जमीनों की खरीद-फरोख्त की गई, लेकिन अब तक किसी भी स्तर पर स्पष्ट सीमांकन नहीं कराया गया है।

भूमि बंदरबांट के प्रमुख आरोप

  1. फर्जी भूखंड निर्माण: परिषद और कर्मचारियों ने मिलकर रिकॉर्ड में फर्जी तरीके से भूखंड बनाकर आसपास की शासकीय भूमि को भी शामिल किया।
  2. रिकॉर्ड का अभाव: कॉलोनी में सार्वजनिक उपयोग की सुविधाओं जैसे रास्ता, खेल मैदान, मंदिर आदि का कोई रिकार्ड नपा कार्यालय में उपलब्ध नहीं है।
  3. पंजीयन में गड़बड़ी: वास्तविक पंजीयनधारकों के नाम हटाकर कर्मचारियों ने अपने, परिजनों या नजदीकियों के नाम दर्ज किए।
  4. धनराशि की अनियमितता: भूखंड आवंटन की रकम को रसीद के बिना मनमाने ढंग से अलग-अलग खातों में जमा किया गया।

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अब सवाल यह है…

क्या राजस्व विभाग और प्रशासन इस गंभीर प्रकरण का स्वतः संज्ञान लेकर साडा कॉलोनी और उससे लगी शासकीय भूमि की निष्पक्ष जांच करेगा? क्या वर्षों से चली आ रही इस नियंत्रणहीन भूखंड नीति पर रोक लगेगी? जनता अब न्याय और पारदर्शिता की मांग कर रही है।

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