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Friday, April 17, 2026
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भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा जल जीवन मिशन: निवाड़ी में 104 करोड़ की योजना में ‘पलीता’

निवाड़ी के 89 गांवों में नल-जल योजना बदहाल

कपिल सिरवैया/​ खबर डिजिटल/निवाड़ी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी ‘जल जीवन मिशन’ योजना निवाड़ी जिले में विभागीय लापरवाही और ठेकेदारी प्रथा के भ्रष्टाचार के दलदल में फंसती नजर आ रही है। जिले के 89 गांवों में जल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए लगभग 104 करोड़ रुपये की लागत से संचालित समूह नल-जल योजना अब ग्रामीणों के लिए सुविधा के बजाय मुसीबत का सबब बन गई है।

​ग्राम पंचायत जेवरा मौरा में जल निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। पाइप लाइन डालने के लिए खोदी गई सड़कों का रेस्टोरेशन (मरम्मत) इतना घटिया है कि छह माह के भीतर ही सड़कें उखड़ गई हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि, ​सड़क निर्माण में एक्सपायरी सीमेंट का उपयोग किया गया है।
​वाहनों के निकलने से सड़क से सफेद डस्ट उड़ रही है, जिससे बड़ी संख्या में ग्रामीण ‘राइनाइटिस’ (Rhinitis) जैसी गंभीर एलर्जी और सांस की बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं।
​पूरी सड़क अब गड्ढों में तब्दील हो चुकी है, जिससे आए दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं।
​योजना का कार्य देख रही जैन इंजीनियरिंग वर्क कंपनी पर तकनीकी मानकों के उल्लंघन के गंभीर आरोप हैं। मुख्य पाइप लाइन को 6 से 7 फीट गहराई में दबाया जाना था, लेकिन इसे मात्र 2 फीट की गहराई पर डाल दिया गया है।
​ रहवासी बस्तियों के बीच से गुजरी इस लाइन में लीकेज होने पर ग्रामीणों के कच्चे मकान ढहने का खतरा पैदा हो गया है।
कंपनी ने मानकों को ताक पर रखते हुए नल कनेक्शन घरों के भीतर देने के बजाय पाइपों को घर के बाहर ही खुला छोड़ दिया है।
​”लोगों के आरोप हैं कि, इसकी शिकायत मुख्यमंत्री हेल्पलाइन (181) पर करते हैं, तो कंपनी के अधिकारी समाधान करने के बजाय शिकायत बंद करवाने के लिए अनैतिक दबाव बनाते हैं।

​हैरानी की बात यह है कि 104 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी ग्राम के कई वार्ड और मोहल्ले आज भी पाइप लाइन से नहीं जुड़ पाए हैं। योजना के ‘कवरेज’ के दावों के विपरीत, धरातल पर कई परिवार अब भी प्रधानमंत्री नल-जल योजना के लाभ से वंचित हैं। पानी की सप्लाई भी सुचारू नहीं हैकभी पानी आता है तो कभी लोग बूंद-बूंद को तरसते हैं।

​भ्रष्टाचार और गुणवत्ताहीन निर्माण की गूंज अब पूरे क्षेत्र में है। जल निगम द्वारा बनाए गए चैंबर भी सामान्य दबाव झेलने की स्थिति में नहीं दिख रहे हैं। सवाल यह उठता है कि, क्या विभाग के उच्चाधिकारियों की नाक के नीचे करोड़ों की बंदरबांट हो रही है? क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी या ग्रामीण ऐसे ही धूल और अव्यवस्था के बीच जीने को मजबूर रहेंगे?

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