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ग्वालियर-चंबल का रण पार्ट-1: में सिंधिया-राघौगढ़ किलों के बीच होगी जंग… ज्योतिरादित्य-जयवर्धन का होगा रोचक मुकाबला

2028 की तैयारी में जुटे दोनों नेता

भोपाल/सुनील बंशीवाल/खबर डिजिटल/ ग्वालियर-चंबल का रण दिग्गजों के लिए जाना जाता है, सबके अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र हैं, लेकिन सालों से सियासत की धुरी पर दो राजघरानों के बीच जंग देखी जा रही है, इसमें सिंधिया और राघौगढ़ किला आमने-सामने होता नजर आता है, चुनावी रण में एक-दूसरे को मात देने के लिए पूरा जोर लगाने की तैयारी होती है, और अगर बात अपने सिपहसालारों की, तो सत्ता परिवर्तन तक की नौबत आ जाती है। वहीं आने वाले चुनावों में एक बार फिर इस राजघराने के रणबांकुरों ज्योतिरादित्य सिंधिया और जयवर्धन सिंह के बीच आमने सामने की सियासी जंग होगी।

सिंधिया के बीजेपी में जाने से बदली परिस्थिति
मध्यप्रदेश की राजनीति में ग्वालियर–चंबल अंचल हमेशा से सत्ता की दिशा तय करने वाला क्षेत्र रहा है। 34 विधानसभा सीटों वाला यह इलाका केवल भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी राज्य की सरकार बनाने या गिराने की क्षमता रखता है। पिछले कुछ दशकों ने इस इलाके ने कई उतार-चढ़ाव देखे, साल 2018 में कांग्रेस की ऐतिहासिक जीत, उसके बाद 2020 का दलबदल और 2023 में लगभग बराबरी पर दिखाई देती बीजेपी और कांग्रेस पार्टी। इसी तरह से आने वाला वक्त भी कुछ नए दांवपेंच लेकर आ सकता है।

दोनों ही दलों को करना होगी खास तैयारी
2018 के विधानसभा चुनाव ग्वालियर-चंबल के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ थे। उस समय कांग्रेस ने इस क्षेत्र की 34 में से 26 सीटें जीतकर भाजपा के लंबे प्रभुत्व को चुनौती दे दी थी। ग्वालियर, मुरैना, भिंड, शिवपुरी, गुना और अशोकनगर जैसे जिलों में कांग्रेस की प्रचंड लहर दिखाई दी, लेकिन इसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ बीजेपी का नारा ‘माफ करो महाराज’ भी कारगर साबित हुआ था, हालांकि कांग्रेस के लिए दिग्विजय सिंह की यात्रा ने भी कमाल दिखाया था, लेकिन अब परिस्थितियां कुछ और है।

पूरे इलाके का बदला परिदृश्य
मार्च 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में शामिल होने से पूरा राजनीतिक परिदृश्य बदल गया। उनके साथ कई कांग्रेस विधायक भाजपा में चले गए और मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार गिर गई। इसके बाद हुए उपचुनावों में भाजपा ने कुछ सीटें जीतकर अपनी स्थिति मजबूत की, लेकिन कांग्रेस ने भी कई सीटों पर अपनी पकड़ बनाए रखी। जिसका असर साल 2023 के विधानसभा चुनावों में स्पष्ट रुप से दिखाई दिया, भाजपा ने 19 सीटें जीतीं और कांग्रेस ने 15 सीटें हासिल कीं। इससे ये साबित हुआ कि ग्वालियर-चंबल में कांग्रेस अब भी मजबूती के साथ खड़ी है।

कई दिग्गजों को करना पड़ा हार का सामना
2023 के चुनावों का एक बड़ा संदेश दिखाई दिया कि सिंधिया के कई करीबी नेताओं को हार का सामना करना पड़ा। डबरा में इमरती देवी, बमोरी में महेंद्र सिंह सिसोदिया और पोहरी में सुरेश राठखेड़ा की हार ने कांग्रेस को एक बार फिर पूरे इलाके में मेहनत के साथ आगे बढ़ने को मजबूर किया। इलाके में कांग्रेस की लहर का असर दतिया विधानसभा पर भी दिखा और पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा तक को हार की मुंह देखना पड़ा।

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