Monday, November 2, 2026
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खोखले दावों के दलदल में फंसा अन्नदाता: कीचड़ से पटी सड़कों पर ‘खेती’ करने को मजबूर ग्रामीण

डिंडोरी /खबर डिजिटल /शैलेश नामदेव/ डिंडोरी, ​जब लोकतंत्र में विकास की बड़ी-बड़ी घोषणाएं जमीनी हकीकत से टकराती हैं, तो व्यवस्था का असली चेहरा नंगा हो जाता है। डिंडोरी जिले का शहपुरा जनपद एक ऐसी ही प्रशासनिक नाकामी का गवाह बना है, जहाँ ग्रामीणों की विवशता ने तंत्र के कानों तक आवाज पहुँचाने के लिए एक ऐसा रास्ता चुना, जिसने हर संवेदनशील नागरिक को झकझोर कर रख दिया है। विकास की फाइलें भले ही दफ्तरों में धूल फांक रही हों, लेकिन सड़कों पर पसरा कीचड़ अब शासन और प्रशासन के मुँह पर करारा तमाचा मार रहा है।

​विकास का खोखला ढांचा: जहाँ सड़क नहीं, धान की रोपाई होती है

​ग्राम पंचायत पड़रिया के पोषक ग्राम धनगांव और पड़रिया के बीच का 3 किलोमीटर का दायरा आज केवल दो गांवों को जोड़ने वाली सड़क नहीं, बल्कि प्रशासनिक दावों की कब्रगाह बन चुका है। मानसून की पहली बारिश के साथ ही यह कच्चा रास्ता पूरी तरह दलदल में तब्दील हो गया। बार-बार की अर्जियों और जनप्रतिनिधियों की चौखट पर माथा टेकने के बाद जब ग्रामीणों की सुध लेने कोई नहीं आया, तो आक्रोश और लाचारी ने एक अनोखे विरोध का रूप ले लिया। ग्रामीणों ने बीच सड़क पर कीचड़ के बीच खड़े होकर धान का रोपा लगा दिया।
​”जब हमारी सड़कें चलने के काबिल नहीं छोड़ी गईं, तो बेहतर है कि हम इस पर खेती करके अपना पेट पाल लें। कम से कम यह कीचड़ किसी काम तो आए।” स्थानीय ग्रामीण

https://x.com/khabardigital/status/2094300706434142229

​जिंदगी और मौत के बीच झूलता 3 किलोमीटर का सफर

​यह विरोध केवल एक प्रतीकात्मक प्रदर्शन नहीं, बल्कि दैनिक यातनाओं का निचोड़ है। इस बदहाल रास्ते पर आए दिन मासूम स्कूली बच्चे और बुजुर्ग हादसे का शिकार हो रहे हैं। दोपहिया वाहन चालकों के लिए यह 3 किलोमीटर का रास्ता मौत के कुएं में गाड़ी चलाने जैसा है।
​स्वास्थ्य सेवाओं से कटाव: एम्बुलेंस और चार पहिया वाहन कीचड़ में धंस जाते हैं। किसी गर्भवती महिला या गंभीर मरीज को आपात स्थिति में शहपुरा अस्पताल पहुँचाना सीधे तौर पर मौत से बाजी लगाने जैसा है।

​शिक्षा पर ताला:

फिसलते रास्ते और गहरे कीचड़ के कारण छोटे बच्चों का स्कूल जाना दूभर हो चुका है, जिससे उनका भविष्य अंधकारमय हो रहा है।

​आर्थिक बदहाली:

खेती-किसानी और मजदूरी के लिए शहपुरा जाने वाले ग्रामीणों का संपर्क जिला मुख्यालय से पूरी तरह कट चुका है।

​कहाँ गया विकास का बजट? प्रशासनिक संवेदनहीनता पर उठे गंभीर सवाल

​पंचायती राज और ग्रामीण विकास की योजनाओं के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये का बजट कागजों पर खर्च दिखाया जाता है। लेकिन धनगांव और पड़रिया कला की यह सड़क चीख-चीखकर सवाल पूछ रही है:
​फंड की हेराफेरी या लापरवाही? वर्षों से लंबित इस 3 किलोमीटर के पक्के निर्माण को आखिर किस फाइल के नीचे दबा कर रखा गया है?

​जिम्मेदारों की खामोशी:

बार-बार दुर्घटनाओं की सूचना के बावजूद जनपद पंचायत और जिला प्रशासन ने अब तक इस रास्ते के सुधार के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाया?
​जनप्रतिनिधियों का दोहरा रवैया:

चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करने वाले स्थानीय प्रतिनिधि आज ग्रामीणों की इस नारकीय स्थिति पर मौन क्यों हैं?

​व्यवस्था की नींद खोलने की आखिरी कोशिश

डिंडोरी, ​जब लोकतंत्र में विकास की बड़ी-बड़ी घोषणाएं जमीनी हकीकत से टकराती हैं, तो व्यवस्था का असली चेहरा नंगा हो जाता है। डिंडोरी जिले का शहपुरा जनपद एक ऐसी ही प्रशासनिक नाकामी का गवाह बना है, जहाँ ग्रामीणों की विवशता ने तंत्र के कानों तक आवाज पहुँचाने के लिए एक ऐसा रास्ता चुना, जिसने हर संवेदनशील नागरिक को झकझोर कर रख दिया है। विकास की फाइलें भले ही दफ्तरों में धूल फांक रही हों, लेकिन सड़कों पर पसरा कीचड़ अब शासन और प्रशासन के मुँह पर करारा तमाचा मार रहा है।

​विकास का खोखला ढांचा: जहाँ सड़क नहीं, धान की रोपाई होती है

​ग्राम पंचायत पड़रिया के पोषक ग्राम धनगांव और पड़रिया के बीच का 3 किलोमीटर का दायरा आज केवल दो गांवों को जोड़ने वाली सड़क नहीं, बल्कि प्रशासनिक दावों की कब्रगाह बन चुका है। मानसून की पहली बारिश के साथ ही यह कच्चा रास्ता पूरी तरह दलदल में तब्दील हो गया। बार-बार की अर्जियों और जनप्रतिनिधियों की चौखट पर माथा टेकने के बाद जब ग्रामीणों की सुध लेने कोई नहीं आया, तो आक्रोश और लाचारी ने एक अनोखे विरोध का रूप ले लिया। ग्रामीणों ने बीच सड़क पर कीचड़ के बीच खड़े होकर धान का रोपा लगा दिया।
​”जब हमारी सड़कें चलने के काबिल नहीं छोड़ी गईं, तो बेहतर है कि हम इस पर खेती करके अपना पेट पाल लें। कम से कम यह कीचड़ किसी काम तो आए।” स्थानीय ग्रामीण

​जिंदगी और मौत के बीच झूलता 3 किलोमीटर का सफर

​यह विरोध केवल एक प्रतीकात्मक प्रदर्शन नहीं, बल्कि दैनिक यातनाओं का निचोड़ है। इस बदहाल रास्ते पर आए दिन मासूम स्कूली बच्चे और बुजुर्ग हादसे का शिकार हो रहे हैं। दोपहिया वाहन चालकों के लिए यह 3 किलोमीटर का रास्ता मौत के कुएं में गाड़ी चलाने जैसा है।
​स्वास्थ्य सेवाओं से कटाव: एम्बुलेंस और चार पहिया वाहन कीचड़ में धंस जाते हैं। किसी गर्भवती महिला या गंभीर मरीज को आपात स्थिति में शहपुरा अस्पताल पहुँचाना सीधे तौर पर मौत से बाजी लगाने जैसा है।

​शिक्षा पर ताला:

फिसलते रास्ते और गहरे कीचड़ के कारण छोटे बच्चों का स्कूल जाना दूभर हो चुका है, जिससे उनका भविष्य अंधकारमय हो रहा है।

​आर्थिक बदहाली:

खेती-किसानी और मजदूरी के लिए शहपुरा जाने वाले ग्रामीणों का संपर्क जिला मुख्यालय से पूरी तरह कट चुका है।

​कहाँ गया विकास का बजट? प्रशासनिक संवेदनहीनता पर उठे गंभीर सवाल

​पंचायती राज और ग्रामीण विकास की योजनाओं के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये का बजट कागजों पर खर्च दिखाया जाता है। लेकिन धनगांव और पड़रिया कला की यह सड़क चीख-चीखकर सवाल पूछ रही है:
​फंड की हेराफेरी या लापरवाही? वर्षों से लंबित इस 3 किलोमीटर के पक्के निर्माण को आखिर किस फाइल के नीचे दबा कर रखा गया है?

​जिम्मेदारों की खामोशी:

बार-बार दुर्घटनाओं की सूचना के बावजूद जनपद पंचायत और जिला प्रशासन ने अब तक इस रास्ते के सुधार के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाया?
​जनप्रतिनिधियों का दोहरा रवैया:

चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करने वाले स्थानीय प्रतिनिधि आज ग्रामीणों की इस नारकीय स्थिति पर मौन क्यों हैं?

​व्यवस्था की नींद खोलने की आखिरी कोशिश

​सड़क के बीचों-बीच लहलहाता धान का रोपा किसी आम किसान का शौक नहीं, बल्कि तंत्र की अनदेखी से उपजा आक्रोश है। ग्रामीणों ने साफ़ कर दिया है कि जब तक पड़रिया कला से धनगांव तक सड़क का पक्कीकरण नहीं हो जाता और इसे सुरक्षित आवागमन के योग्य नहीं बनाया जाता, उनका यह संघर्ष जारी रहेगा।
​अब देखना यह है कि सड़क पर बोया गया यह धान अधिकारियों की बंद आँखों को खोल पाता है या फिर कागजी विकास का यह खेल यूं ही ग्रामीणों की जिंदगी से खिलवाड़ करता रहेगा।​सड़क के बीचों-बीच लहलहाता धान का रोपा किसी आम किसान का शौक नहीं, बल्कि तंत्र की अनदेखी से उपजा आक्रोश है। ग्रामीणों ने साफ़ कर दिया है कि जब तक पड़रिया कला से धनगांव तक सड़क का पक्कीकरण नहीं हो जाता और इसे सुरक्षित आवागमन के योग्य नहीं बनाया जाता, उनका यह संघर्ष जारी रहेगा।
​अब देखना यह है कि सड़क पर बोया गया यह धान अधिकारियों की बंद आँखों को खोल पाता है या फिर कागजी विकास का यह खेल यूं ही ग्रामीणों की जिंदगी से खिलवाड़ करता रहेगा।

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