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Friday, April 17, 2026
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Nigam Mandal List: निगम-मंडल की आस में ‘हाजिरी’ का खेल, भाई साहब, हमारा देख लेना

Nigam Mandal List: मध्य प्रदेश भाजपा में इन दिनों सत्ता और संगठन के गलियारों में एक अजीब सा खेल देखने को मिल रहा है। जहां एक तरफ मोहन सरकार के गठन के समय नए चेहरों को मौका मिलने से आम कार्यकर्ताओं में उत्साह देख गया था, वहीं अब नियुक्तियों का दौर शुरू होते ही यह उत्साह असंतोष और होड़ में बदलता नजर आ रहा है। आलम यह है कि जो कार्यकर्ता कल तक मैदान में जोश भर रहे थे, वे अब चेंबरों के चक्कर काट रहे हैं।

भाई साहब, मेरा भी ध्यान रखिएगा

पिछले एक हफ्ते से शांत पड़े भाजपा के प्रदेश कार्यालय में अब अचानक रौनक लौट आई है, लेकिन यह रौनक संगठन की मजबूती से ज्यादा व्यक्तिगत जुगाड़ की ओर इशारा कर रही है। जैसे ही किसी वरिष्ठ पदाधिकारी के कार्यालय पहुंचने की खबर आती है, समर्थकों के साथ कार्यकर्ताओं का हुजूम उमड़ पड़ता है। हर कोई किसी न किसी चेंबर में झांककर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहता है। दफ्तर के गलियारों में भाई साहब, मेरा भी ध्यान रखिएगा जैसे जुमले आम हो गए हैं, जो धीरे से कान में फुसफुसाए जाते हैं।

ठगा महसूस कर रहे पुराने सिपाही!

जैसे-जैसे नियुक्तियों का पिटारा खुल रहा है, भाजपा के अंदर दो धड़े साफ नजर आने लगे हैं। वे कार्यकर्ता जिनकी नियुक्तियां हो चुकी हैं, वे स्वागत-सत्कार कराकर अब शांत बैठ गए हैं। वही वे सक्रिय कार्यकर्ता जो मोहन फॉर्मूला के तहत अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे, अब समय बीतने के साथ खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। उन्हें डर है कि कहीं नियुक्तियों की यह ट्रेन उनके बिना ही न छूट जाए।

अभी बहुत कुछ है बाकी

कार्यकर्ताओं की इस भागदौड़ के पीछे बड़ी वजह यह है कि अभी भी कई महत्वपूर्ण नियुक्तियां लंबित हैं। 10 प्रकोष्ठों के अलावा प्रदेश कार्यसमिति की घोषणा होना बाकी है। सबसे बड़ा आकर्षण निगम-मंडल और प्राधिकरण हैं, जहां बड़ी संख्या में राजनीतिक नियुक्तियां होनी हैं। हर जिले से आने वाले कार्यकर्ता की यही मंशा है कि किसी भी पद पर जुगाड़ फिट हो जाए, ताकि क्षेत्र में उनकी भाई साहब वाली छवि बरकरार रहे और रसूख बना रहे।

अध्यक्ष खंडेलवाल के सामने बड़ा पहाड़

प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के लिए यह स्थिति किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। एक तरफ वे अधिक से अधिक समर्पित कार्यकर्ताओं को संतुष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अपेक्षाओं का बढ़ता बोझ और कार्यकर्ताओं का भारी दबाव उनके सामने बड़ी चुनौती बनकर खड़ा हो गया है। हर कार्यकर्ता अपनी सेवा का फल पद के रूप में चाहता है, जिससे निपटना संगठन के लिए सिरदर्द साबित हो रहा है।

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