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भारत आयात पर निर्भरता खत्म कर सकता है, अगर यह अपने संसाधनों की क्षमता का सदुपयोग करे, वेदांता के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने कहा

नई दिल्लीः वेदांता के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने भारत की विशाल प्राकृतिक संसाधन क्षमता के सदुपयोग के लिए निर्णायक कदम उठाने का आह्वान किया। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि देश को घरेलू अन्वेषण और उत्पादन को तेज़ करना चाहिए ताकि हम ऊर्जा सुरक्षा को सशक्त बना सकें और आयात पर निर्भरता कम कर सकें।

आज एक ओद्यौगिक सम्मेलन के दौरान अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने चुनौती की गंभीरता पर रोशनी डाली और कहा कि भारत अपने तेल का 90 फीसदी, कॉपर का 95 फीसदी, सोने का तकरीबन 99.5 फीसदी आयात करता है, बावजूद इसके कि हमारे पास इन संसाधनों के बड़े भंडार हैं, जिनका अब तक इस्तेमाल नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि भूविज्ञान की दृष्टि से हमारा देश दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में से एक है, इसमें भारत की ऊर्जा एवं खनिज सुरक्षा को सशक्त बनाने की अपार क्षमता है।

उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों की खोज एवं खनन में तेज़ी लाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि अगर भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों और संसाधन कंपनियों को उचित नीतियों एवं जल्द अनुमोदन का साथ मिले तो वे अपनी उत्पादन क्षमता को कई गुना बढ़ा सकती हैं। उन्होंने कहा कि कई सरकारी संसाधनों का प्रदर्शन आज भी उनकी क्षमता के मुताबिक नहीं है, सही निवेश, प्रबन्धन एवं नीतिगत सहयोग के द्वारा उनकी उत्पादन क्षमता को काफी हद तक बढ़ाया जा सकता है।

पहले सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों में बदलाव लाने के वेदांता के अनुभव की बात करते हुए अग्रवाल ने कहा कि हिंदुस्तान ज़िंक और भारत एलुमिनियम सहित कई कंपनियों के निजीकरण एवं पेशेवर प्रबन्धन के बाद उनका उत्पादन पांच से दस गुना बढ़ा है, ये आंकड़े भारत के संसाधन क्षेत्र की अप्रयुक्त क्षमत को दर्शाते हैं। हाल ही में एक पोस्ट में अग्रवाल ने कहा था कि वेदांता ने एक निजीकरण प्रोग्राम के तहत हिंदुस्तान ज़िंक और बाल्को का अधिग्रहण किया, जो कभी पूरा नहीं हुआ और सरकार के पास अभी भी इनकी क्रमशः 26 फीसदी एवं 49 फीसदी हिस्सेदारी है। गौरतलब है कि वेदांता ने पिछले दस सालों में सरकारी कोष में रु 4.5 लाख करोड़ का योगदान दिया है।

वेदांता के चेयरमैन ने निवेश और इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए उद्यमियों को सशक्त बनाने और विनियमों को आसान बनाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। उन्होंने सेल्फ-सर्टिफिकेशन और भरोसे पर आधारित शासन पर निर्भरता बढ़ाने बात कही, और तर्क दिया कि विनियामक मामलों में ज़रूरत से ज़्यादा दखल अक्सर प्रोजेक्ट्स में देरी करता है। उन्होंने आगे कहा कि भारत को लम्बे अनुमोदन और क्लीयरेंस के बजाय सेल्फ-सर्टिफिकेशन की ओर बढ़ना चाहिए, जहाँ सरकार नियम तय करे और उद्यमी उनका पूरी सख्ती से पालन करें, बाद में उनका ऑडिट किया जाए।

पश्चिम एशिया संकट के बीच, अग्रवाल ने घरेलू उत्पादन के महत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने सुझाव दिया कि भारत को ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने और वैश्विक आपूर्ति में आने वाले झटकों के प्रति संवेदनशीलता को कम करने के लिए तेल, गैस, कोयला, धातुओं और महत्वपूर्ण खनिजों की खोज को गति प्रदान करनी चाहिए।

उन्होंने आगे कहा कि आने वाले वर्षों में भारत की ऊर्जा की मांग दोगुनी होने की उम्मीद है, ऐसे में देश के लिए अपने घरेलू ऊर्जा इकोसिस्टम में विविधता लाना और उसे मज़बूत बनाना और भी ज़रूरी हो जाता है।

अग्रवाल ने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत के संसाधन क्षेत्रों को बढ़ावा देने से आर्थिक विकास को गति मिलेगी। उनके अनुसार, तेल, गैस, तांबा, कोयला, सोना और उर्वरक जैसे क्षेत्रों में घरेलू भंडारों का लाभ उठाने से बड़े पैमाने पर रोज़गार के अवसर उत्पन्न होंगे, सरकार का राजस्व बढ़ेगा और आयात पर निर्भरता कम होगी। उन्होंने यह भी बताया कि प्राकृतिक संसाधन क्षेत्र ने ऐतिहासिक रूप से भारत और दुनिया भर में सरकारी खजाने में सबसे ज़्यादा राजस्व का योगदान दिया है और राष्ट्र-निर्माण में अहम भूमिका निभाई है।

उन्होंने भारत की, विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी संसाधन कंपनियाँ बनाने की क्षमता पर भी ज़ोर दिया।

अपनी बात समाप्त करते हुए, अग्रवाल ने इस क्षेत्र के लिए बड़े पैमाने पर पूँजी जुटाने हेतु सरकार, उद्योग और विश्वस्तरीय निवेशकों के बीच आपसी सहयोग के महत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत, प्राकृतिक संसाधनों और ऊर्जा के बुनियादी ढाँचे में दीर्घकालिक निवेश के लिए दुनिया के सबसे आकर्षक गंतव्यों में से एक है।

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