Tuesday, November 3, 2026
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Shamli Election 2027: शामली में इस बार किसका बजेगा डंका? जाट-मुस्लिम समीकरण के बीच बदला पूरा चुनावी गणित



पश्चिमी उत्तर प्रदेश की अहम विधानसभा सीट शामली पर 2027 के चुनाव को लेकर अभी से राजनीतिक हलचल तेज है. इस सीट का चुनावी समीकरण लंबे समय से जाट और मुस्लिम मतदाताओं के इर्द-गिर्द घूमता रहा है. लेकिन इस बार परिस्थितियां पहले जैसी नहीं हैं. 2022 में समाजवादी पार्टी और आरएलडी एक साथ चुनाव मैदान में थीं, जबकि अब आरएलडी बीजेपी के साथ गठबंधन का हिस्सा है. ऐसे में शामली में इस बार मुकाबले का पूरा गणित नए सिरे से बनता नजर आ रहा है.

सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर है कि जाट मतदाता किस तरफ जाते हैं. अगर जाट वोट बीजेपी-आरएलडी गठबंधन के पक्ष में मजबूती से जाता है, तो गठबंधन को फायदा मिल सकता है. वहीं मुस्लिम, दलित और गैर-जाट ओबीसी वोटरों की एकजुटता सपा के लिए मुकाबले को मुश्किल से आसान बना सकती है.

करीब 3 लाख मतदाता, जातीय समीकरण बेहद अहम

शामली सीट पर करीब तीन लाख मतदाता हैं. इनमें लगभग 70 हजार जाट और 70 से 80 हजार मुस्लिम मतदाता बताए जाते हैं. इनके अलावा करीब 45 हजार दलित, 30 से 35 हजार वैश्य, 25 हजार कश्यप, 20 हजार गुर्जर और करीब 12 हजार ब्राह्मण वोटर हैं.

यही वजह है कि चुनावी मैदान में उतरने वाली पार्टियों के लिए हर समुदाय का समर्थन मायने रखेगा. छोटे अंतर से जीत-हार तय होने वाली इस सीट पर अलग-अलग सामाजिक समूहों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है.

2022 में RLD ने बदला था नतीजा

शामली के पिछले चुनावों में गठबंधन की राजनीति का असर साफ नजर आया है. 2012 में कांग्रेस के पंकज मलिक ने जीत दर्ज की थी. इसके बाद 2017 में सपा और आरएलडी अलग-अलग चुनाव लड़े, जिसका फायदा बीजेपी को मिला और तेजेंद्र निरवाल विधायक बने.

2022 में समीकरण पूरी तरह बदल गया. सपा और आरएलडी ने मिलकर चुनाव लड़ा और आरएलडी के प्रसन्न कुमार चौधरी ने करीब सात हजार वोटों के अंतर से जीत हासिल की.

RLD को गठबंधन से उम्मीद

मौजूदा विधायक प्रसन्न चौधरी को भरोसा है कि बीजेपी और आरएलडी के साथ आने से उनका पलड़ा मजबूत रहेगा. उनका कहना है कि चौधरी चरण सिंह की विचारधारा के तहत वे सभी वर्गों के बीच पहुंच बना रहे हैं और उन्हें हिंदू, मुस्लिम, एससी, वैश्य, ब्राह्मण और कश्यप समाज का समर्थन मिल रहा है.

सपा के सामने गैर-जाट वोटों को साधने की चुनौती

आरएलडी के बीजेपी के साथ आने से जाट वोटों का बड़ा हिस्सा गठबंधन के पक्ष में जाने की संभावना है. दूसरी ओर मुस्लिम मतदाताओं का रुख चुनाव में बड़ा फैक्टर बन सकता है. अगर मुस्लिम वोट आरएलडी से दूरी बनाता है, तो गठबंधन को वैश्य, गुर्जर, कश्यप और ब्राह्मण मतदाताओं में मजबूत पकड़ बनानी होगी.

वहीं सपा की रणनीति मुस्लिम, दलित और गैर-जाट ओबीसी मतदाताओं को एक साथ लाने पर टिक सकती है. फिलहाल पूर्व विधायक राजेश्वर बंसल के बेटे अखिल बंसल का नाम दावेदार के तौर पर चर्चा में है. हालांकि चुनाव में अभी समय है, इसलिए उम्मीदवारों, गठबंधनों और स्थानीय समीकरणों में बदलाव की गुंजाइश बनी हुई है.

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