देवास/पवन उपाध्याय/खबर डिजिटल/बागली विकासखंड की 118 पंचायतों में लगभग 60 ग्राम पंचायतें आदिवासी बाहुल्य होकर आजीविका के लिए कृषि आधारित मजदूरी के अतिरिक्त कोई बड़ा रोजगार का साधन नहीं है। मनरेगा में कम राशि लेट भुगतान और भ्रष्टाचार के कारण स्थानीय ग्रामीण बड़ी संख्या में महाराष्ट्र, गुजरात सहित अलग-अलग स्थानों पर रोजगार की तलाश में जाते हैं। काम के अभाव में रोजगार के लिए आदिवासी क्षेत्रों के गांवों से बड़ी संख्या में परिवार बड़े शहरों में रहते हैं, जबकि जनपद पंचायत के पास इस पलायन का कोई अधिकृत रिकॉर्ड नहीं है।
पिछले 3 दिनों में 6 से ज्यादा बसें गई
बागली विकासखंड के गांवों से बीते 3 दिनों में 6 से अधिक बसों से बड़ी संख्या में ग्रामीण अपने परिवार सहित महाराष्ट्र के पुणे में 6 माह की अवधि तक ईंट बनाने का काम करेंगे, जिसके लिए पूर्व में अनुबन्ध करके उन्हें एडवांस राशि दी जाती है, कार्यस्थल पर रहने खाने का इंतजाम होता है। तहसील मुख्यालय से लगा ग्राम कालीकोठी की देवकी तोमर ने नम आखों से बताया कि यहां मजदूरी कम मिलती है, इसलिए परिवार सहित जा रहे हैं। गांव से 20 लोग हैं, 6 माह काम करेंगे।
लोगों ने जाहिर की अपनी पीड़ा
इसी तरह पलायन कर जा रहे दुर्गेश ने बताया कि क्या करें काम नहीं है, परिवार सहित जा रहे हैं बच्चों की पड़ाई खराब होगी। इसी तरह लोगों के ले जाने वाले व्यक्ति संदीप ने बताया कि प्रत्येक गांवों से लोग परिवार सहित जा रहे हैं, मेरी एक बस है, अलग-अलग दलाल आए हैं, लगभग 6 बसें जा चुकी हैं। पहले अनुबन्ध करके 50 प्रतिशत राशि देते हैं, वहीं रहने की सुविधा होती है, 6 माह बाद वापसी होगी।
स्थानीय रोजगार के दावों पर उठे सवाल
स्थानीय स्तर पर रोजगार नहीं होने से मौसम अनुरूप कृषि पलायन के अतिरिक्त अन्य राज्यों में लोग जाते हैं, जबकि शासन की मुफ्त अनाज, मनरेगा से मजदूरी, शिक्षा स्वास्थ्य, के लिए करोडों खर्च होता है, लेकिन लोगों को योजनाओं का लाभ नहीं मिलता है। इसी कारण लोग रोजगार की तलाश में शहरों की ओर जाते हैं, वहीं अधिकारियों ने इस मुद्दे पर कुछ भी कहने से इंकार कर दिया।


