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Friday, April 17, 2026
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Dindori News : समनापुर से दिल्ली तक चमका ‘दुधेरा की बेटी का परचम’… प्रियंका मरावी ने रचा इतिहास

नारी शक्ति आजीविका महासंघ की हैं मरावी

डिंडौरी/शैलेश नामदेव/ खबर डिजिटल/ ग्राम दुधेरा , ग्राम पंचायत बम्हनी , विकासखण्ड समनापुर की युवा प्रियंका मरावी ने वह कर दिखाया, जिसे सुनकर गांव से लेकर दिल्ली तक गर्व महसूस किया जा रहा है। प्रियंका नारी शक्ति आजीविका महासंघ बम्हनी से जुड़ी ऐसी युवती हैं, जिन्होंने अपने संघर्ष, साहस और संकल्प के दम पर न सिर्फ अपना जीवन बदला बल्कि पूरी पंचायत की बेटियों के लिए प्रेरणा बन गईं।

चुनौतियों से भरा प्रियंका का जीवन
किसान और दिहाड़ी मजदूर परिवार में जन्मी प्रियंका का बचपन हमेशा चुनौतियों से भरा रहा। खेती और सीमित आय पर निर्भर परिवार में आर्थिक कठिनाइयाँ हमेशा रहती थीं। बावजूद इसके प्रियंका ने हालातों से समझौता न करके पढ़ाई जारी रखी और मेहनत के दम पर अपने पैरों पर खड़े होने का रास्ता ढूँढा।

छोटे पोल्ट्री यूनिट से शुरू होकर दिल्ली IIT तक पहुंचा सफर
आजीविका मिशन एवं PRADAN संस्था द्वारा गठित स्वयं सहायता समूह (SHG) से जुड़कर प्रियंका ने अपने जीवन की दिशा बदली। ‘पोल्ट्री सहकारी’ के माध्यम से उन्हें छोटा पोल्ट्री यूनिट मिला, जिससे परिवार की आय बढ़ने लगी। यही आर्थिक मजबूती आगे चलकर प्रियंका के आत्मविश्वास का आधार बनी।

‘हिम्मत नहीं टूटने दी’ – प्रियंका की संघर्षगाथा
PRADAN के युवक शक्ति कार्यक्रम (YSP) में चयनित होने के बाद प्रियंका को दिल्ली स्थित IIT, और MPA डिवेलपमेंट स्टडीज जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के मॉडल देखने का अवसर मिला। यह उनके जीवन का प्रेरणादायी मोड़ साबित हुआ।

प्रियंका मरावी ने दी जानकारी
प्रियंका बताती हैं कि “संघर्ष ने मुझे झुकने नहीं दिया। कई बार हालात ने हार मानने पर मजबूर किया, लेकिन खुद पर भरोसा बनाए रखा। परिवार की गरीबी और सीमित संसाधन मेरे कदम रोक नहीं सके।” आज प्रियंका गांव की अन्य युवतियों के लिए रोल मॉडल बन चुकी हैं। उनका मानना है कि सही मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और संकल्प से किसी भी गांव की बेटी बड़े से बड़ा मुकाम हासिल कर सकती है।

गांव की बेटियों के लिए बनी मिसाल
गांव की बेटियों के लिए बनी मिसाल, आज प्रियंका न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि अन्य महिलाओं को भी आजीविका, पैदावार, समूह संचालन और वित्तीय सशक्तिकरण के लिए प्रेरित कर रही हैं। उनकी सफलता ने साबित कर दिया कि “चमकने के लिए शहर नहीं, हौसला चाहिए… और हौसला गांव की बेटियों में कम नहीं होता।”

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