अशोकनगर/खबर डिजिटल/ मध्यप्रदेश का एक ऐसा स्थान जहां भगवान श्रीराम के बिना माता सीता की पूजा की जाती है, जीहां बुंदेलखंड और चंबल की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र विश्व प्रसिद्ध करीला धाम वो स्थान है, जहां आस्था और विश्वास का संगम आंखों से देखा जा सकता है, जहां पर ना राघव और ना ही हनुमान दर्शन देते हैं, वहां दर्शन देती है, सतीत्व की मिसाल मां जानकी, जो भी भक्त उनके सामने सच्चे दिल से अपनी मनोकामना लेकर आता है, मान्यता है कि वो झट से पूरी हो जाती है। इस सिद्ध स्थान पर त्रेता युग से ही रंगपंचमी के मौके पर मेला लगाया जाता है, और कहा जाता है कि इस समय माता जानकी से जो भी मांगोगे, वो अवश्य मिलेगा।
विदेशों से भी आते हैं भक्त
इस बार भी करीला धाम पर रंगपंचमी के मौके पर भव्य मेला लगाया गया है, जहां सबसे पहले सीएम डॉ. मोहन यादव ने माता जानकी की आराधना कर प्रदेश की समृद्धि की कामना की। हर साल की तरह इस साल भी यहां पर लाखों श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद है। यहां बुंदेलखंड, चंबल, यूपी, राजस्थान के अलावा विदेश से भी श्रद्धालु रंग पंचमी पर माता के दर्शन करने पहुंचते हैं। वहीं 7 मार्च से शुरू होकर 9 मार्च तक यह मेला चलेगा, जिसमें लाखों श्रद्धालु माता जनकनंदिनी से अपनी मन की मुराद मांगेंगे।
संजय दत्त ने दिया था मां को धन्यवाद
करीला धाम को लेकर मान्यता है कि रंग पंचमी के दिन मां जानकी और यहां पर स्थित गुफा के दर्शन करने से हर मनोकामना पूर्ण होती है, मन्नत पूरी होने के बाद यहां पर बधाई करने की परंपरा है, रंग पंचमी पर यहां पर हजारों नृत्यांगनाओं के द्वारा राई बधाई के प्रस्तुति दी जाती है, दूसरा जो श्रद्धालु माता के दर्शन करने आते हैं वह उनके लिए बधाई देकर जाते हैं। जहां पर प्रसिद्ध अभिनेता संजय दत्त भी बधाई करा चुके हैं, और उन्होंने मन्नत पूरी होने के बाद नृत्यांगनाओं द्वारा राई बधाई कराया जाता था।
माता जानकी के साथ लव-कुश विराजमान
करीला धाम में मां जानकी का ऐसा ऐतिहासिक दिव्य भव्य मंदिर है, जहां माता अपने दोनों पुत्र लव कुश और ऋषि वाल्मीकि जी के साथ विराजमान हैं, यहां भगवान राम के बिना ही माता जानकी की पूजा होती है, यह मंदिर अशोकनगर जिले में एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है, इस पहाड़ी के चारों तरफ नीचे भव्य मेला लगता है, जिसमें भक्त अपने-अपने माध्यमों से पहुंचकर मां जानकी के सामने दरख्वास्त रखते हैं।
राई नृत्यांगनाओं का विशेष महत्व
करीला धाम वही स्थान है, जहां मां जानकी ने भगवान श्रीराम परित्याग करने के बाद लव-कुश को जन्म दिया था, वो जगह करीला धाम ही है, लेकिन, माता को जब सोच हुआ कि अगर वह अयोध्या में होती तो उनके बच्चों का जन्म उत्सव धूमधाम से मनाया जाता, तब ऋषि वाल्मीकि जी ने मां के मन की बात जान ली, स्वर्ग से अप्सराओं का आह्वान किया, तब इंद्र की सभा में नृत्य करने वाली अप्सराएं धरती पर आईं और लव-कुश के जन्म उत्सव पर रात भर बधाई की। जब सुबह माता से विदाई मांगने लगीं तो उनके पास ज्यादा कुछ नहीं था, तब अप्सराओं ने वरदान मांगा था कि जब तक पृथ्वी रहे तब तक उनका यह नृत्य होता रहे, इसी को निभाने के लिए राई नृत्यांगनाएं अप्सरा का रुप धरती है, जिन्हें वरदान है कि उनकी सुंदरता अप्सराओं से निखरी रहेगी, और वो राई नृत्य के जरिए मोहित करती रहेंगी। माना जाता है कि राई नृत्य की शुरुआत भी यहीं से हुई, जो बुंदेलखंड का पारंपरिक नृत्य बना।
गुफा से भभूत ले जाना जरुरी
इस दिव्य धाम को लेकर मान्यता है कि त्रेता युग में माता सीता ने लव-कुश को जिस गुफा में जन्म दिया था, वो अशोकनगर की पहाड़ी पर है, यह गुफा साल भर में केवल एक दिन के लिए रंग पंचमी को खुलती है, सबसे पहले यहां के पुजारी द्वारा गुफा का पूजन किया जाता है, फिर गुफा 24 घंटे तक खुली रखते हैं, यहां लाखों श्रद्धालु माता जानकी मंदिर के साथ इस गुफा के दर्शन करते हैं, गुफा में जो अग्नि प्रज्जवलित है, उसकी भभूत को लोग अपने साथ घर ले जाते हैं, परिजनों को खिलाते हैं, खेतों में डालते हैं, जिसकी वजह से अच्छी फसल होती है, और धन वैभव, सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
मंदिर की लोकेशन
करीला माता का मंदिर अशोकनगर से 30 किलोमीटर दूर, मुंगावली से 35 किलोमीटर दूर, गुना से 75 किलोमीटर, विदिशा से 80 किलोमीटर, सागर से 140 किलोमीटर दूर है, इस क्षेत्र में जाने के लिए बस और ट्रेन दोनों की सुविधा है।


