सौरभ श्रीवास्तव संवाददाता कटनी – जिले में पुलिस द्वारा चलाए गए सघन कॉम्बिंग गश्त अभियान को लेकर जहां एक ओर प्रशासन अपनी पीठ थपथपा रहा है, वहीं दूसरी ओर इस कार्रवाई की प्रभावशीलता और वास्तविक परिणामों पर सवाल उठने लगे हैं।पुलिस अधीक्षक के निर्देशन में 19-20 मार्च की रात चलाए गए इस अभियान में 100 से अधिक वारंट तामील करने और कई संदिग्धों की जांच का दावा किया गया है, लेकिन जानकारों का कहना है कि इस तरह के अभियान अक्सर केवल कागजी आंकड़ों तक सीमित रह जाते हैं।स्थानीय लोगों का आरोप है कि असली और प्रभावशाली अपराधी अब भी पुलिस की पकड़ से बाहर हैं, जबकि छोटी-मोटी गतिविधियों में शामिल लोगों पर ही कार्रवाई कर आंकड़े बढ़ाए जाते हैं। कई क्षेत्रों में यह भी चर्चा है कि निगरानी बदमाशों की “औपचारिक चेकिंग” तो हुई, लेकिन उनके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।अवैध शराब के खिलाफ 6 प्रकरण दर्ज करने और कुछ वाहनों की जब्ती को भी लोग बड़ी उपलब्धि मानने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि जिले में अवैध शराब और अन्य गैरकानूनी गतिविधियां पहले की तरह ही जारी हैं, जिससे इस कार्रवाई की गंभीरता पर प्रश्नचिन्ह लग रहा है।इसके अलावा, धारा 126, 129 और 135 के तहत बड़ी संख्या में लोगों पर की गई कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ नागरिकों का कहना है कि इस तरह की कार्यवाही आम लोगों पर दबाव बनाने का माध्यम बनती है, जबकि संगठित अपराध पर इसका असर कम ही दिखाई देता है।रात्रि गश्त और सार्वजनिक स्थानों की चेकिंग को लेकर भी लोगों का कहना है कि यह पहल स्वागत योग्य है, लेकिन यदि यह केवल एक-दो दिन तक सीमित रहे तो इसका कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ता।निष्कर्ष:कॉम्बिंग गश्त जैसे अभियान तभी प्रभावी माने जाएंगे जब उनका असर जमीन पर दिखाई दे, बड़े अपराधियों पर कार्रवाई हो और आम जनता को वास्तविक सुरक्षा का अनुभव हो—वरना ऐसे अभियान सिर्फ आंकड़ों और दावों तक ही सीमित रह जाएंगे।
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