Monday, November 2, 2026
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Jyotiraditya Scindia vs Kp Yadav…. बीजेपी में फिर बढ़ी वर्चस्व की जंग, खींचतान ने बढ़ाई टेंशन

मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर केंद्रीय मंत्री Jyotiraditya Scindia और पूर्व सांसद KP Yadav के बीच पुरानी खींचतान चर्चा का विषय बन गई है. गुना-शिवपुरी इलाके में दोनों नेताओं के समर्थकों के बीच लंबे समय से चल रही वर्चस्व की लड़ाई अब खुलकर सामने आने लगी है. भाजपा के अंदर भी इस टकराव को लेकर लगातार चर्चाएं तेज हो रही हैं और माहौल पहले से ज्यादा गरम दिखाई दे रहा है.

दोनों गुटों के समर्थकों के बीच तीखी बयानबाजी

हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर दोनों गुटों के समर्थकों के बीच तीखी बयानबाजी देखने को मिली. एक-दूसरे पर तंज कसने के साथ कई आपत्तिजनक टिप्पणियां भी सामने आईं. ‘बालक बुद्धि’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर समर्थकों ने राजनीतिक हमले किए, जिससे विवाद और बढ़ गया. स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पार्टी नेतृत्व को दखल देना पड़ा. भाजपा ने दोनों पक्षों से जुड़े कुछ नेताओं को नोटिस जारी किए, जबकि कुछ कार्यकर्ताओं ने नाराजगी में इस्तीफा भी दे दिया. इससे साफ है कि यह सियासी संघर्ष फिलहाल थमता नजर नहीं आ रहा.

कैसे शुरू हुआ विवाद

दरअसल इस नए विवाद की शुरुआत उस समय और तेज हुई जब केपी यादव को मध्य प्रदेश राज्य खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति निगम का अध्यक्ष बनाया गया. सरकार की ओर से मिली इस जिम्मेदारी के बाद उनके समर्थकों में खासा उत्साह देखा जा रहा है. वहीं सिंधिया समर्थकों को यह राजनीतिक ताकत बढ़ाने की कोशिश के रूप में दिखाई दे रहा है. इसी वजह से दोनों गुटों के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है और क्षेत्रीय राजनीति में इसका असर साफ नजर आने लगा है.

2019 के लोकसभा चुनाव से जुड़ा है मामला

अगर इस पूरे विवाद की जड़ को समझें तो मामला साल 2019 के लोकसभा चुनाव से जुड़ा हुआ है. उस चुनाव में केपी यादव ने भाजपा प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ते हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया को गुना सीट से हराकर बड़ा राजनीतिक उलटफेर कर दिया था. उस समय सिंधिया कांग्रेस में थे और उनकी हार ने प्रदेश की राजनीति में बड़ा संदेश दिया था. यही चुनावी मुकाबला आज भी दोनों नेताओं के समर्थकों के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई का मुख्य कारण माना जाता है.

राजनीतिक परिस्थितियों में आया है बदलाव

हालांकि अब राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं और सिंधिया भाजपा का हिस्सा हैं, लेकिन उनके और केपी यादव के समर्थकों के बीच प्रतिस्पर्धा कम नहीं हुई है. दोनों गुट अपने-अपने नेता का प्रभाव साबित करने में जुटे हुए हैं. फिलहाल इस पूरे मामले पर ज्योतिरादित्य सिंधिया की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन क्षेत्र की राजनीति में यह टकराव आने वाले समय में और बड़ा रूप ले सकता है.

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