Tuesday, November 3, 2026
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CM मोहन का बड़ा ऐलान, किसान अब चिंता मुक्त होकर जमा करें कृषि ऋण, अगले 5 वर्षों में दुग्ध उत्पादन में नम्बर-1 बनेगा MP

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 6 जुलाई को ग्वालियर में आयोजित उन्नत कृषि संभागीय कार्यशाला में हिस्सा लेकर किसानों से सीधे संवाद किया. यह कार्यक्रम डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती के अवसर पर आयोजित किया गया था. मुख्यमंत्री ने कहा कि किसानों की आय बढ़ाने का सबसे प्रभावी तरीका केवल पारंपरिक खेती पर निर्भर रहना नहीं है. यदि किसान बहु-फसली खेती, प्राकृतिक कृषि और पशुपालन को साथ लेकर चलें तो उनकी आमदनी कई गुना बढ़ सकती है. इसी उद्देश्य से राज्य सरकार आधुनिक खेती और डेयरी विकास को प्राथमिकता दे रही है.

दूध उत्पादन में मध्यप्रदेश को नंबर वन बनाने का लक्ष्य

मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्तमान में मध्यप्रदेश देश में दूध उत्पादन के मामले में तीसरे स्थान पर है. सरकार का लक्ष्य अगले पांच वर्षों के भीतर प्रदेश को इस क्षेत्र में देश का अग्रणी राज्य बनाना है. उन्होंने बताया कि नेशनल डेयरी विकास योजना के तहत ग्वालियर दुग्ध संघ और सांची दुग्ध संघ को लगातार सहयोग दिया जा रहा है, जिसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आने लगे हैं.

13 करोड़ रुपये की हाईटेक नर्सरी परियोजना का शुभारंभ

कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने ग्वालियर में बनने वाली आधुनिक हाईटेक नर्सरी और फ्लोरीकल्चर गार्डन का रिमोट के माध्यम से भूमिपूजन किया. राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत करीब 13 करोड़ रुपये की लागत से खुरैरी और जहांगीरपुर गांव में इस परियोजना के पहले चरण का निर्माण होगा. साथ ही उद्यानिकी, मत्स्य पालन और कृषि विभाग की विभिन्न योजनाओं के लाभ भी किसानों को वितरित किए गए.

सिंचाई क्षेत्र बढ़ाने और किसानों को राहत देने पर जोर

मुख्यमंत्री ने बताया कि वर्ष 2003 में प्रदेश का सिंचित क्षेत्र लगभग 7.5 लाख हेक्टेयर था, जो अब बढ़कर करीब 50 लाख हेक्टेयर हो चुका है. सरकार का लक्ष्य इसे 100 लाख हेक्टेयर तक पहुंचाना है. उन्होंने कहा कि चंबल-पार्वती-कालीसिंध और केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजनाएं इस दिशा में बड़ी भूमिका निभाएंगी. इन परियोजनाओं की मंजूरी के लिए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार भी व्यक्त किया.

उन्होंने किसानों को बड़ी राहत देते हुए कहा कि अब कृषि ऋण चुकाने के लिए 31 मार्च की समय सीमा का दबाव नहीं रहेगा. किसानों को पूरे वर्ष के भीतर ऋण जमा करने की सुविधा दी गई है, जिससे उन्हें आर्थिक योजना बनाने में आसानी होगी.

गौ संरक्षण और प्राकृतिक खेती को मिलेगा बढ़ावा

मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार गौ संरक्षण और देशी नस्ल की गायों के संवर्धन के लिए लगातार काम कर रही है. शहरी क्षेत्रों में निराश्रित गायों के बेहतर प्रबंधन के लिए बड़ी गौशालाएं विकसित की जा रही हैं. ग्वालियर की लाल टिपारा गौशाला की तर्ज पर इंदौर, भोपाल, उज्जैन और जबलपुर में भी बड़े स्तर पर गौशालाएं स्थापित की जा रही हैं.

किसानों ने साझा किए प्राकृतिक खेती के सफल अनुभव

कार्यशाला में कई प्रगतिशील किसानों ने अपने अनुभव भी साझा किए. ग्वालियर के बिलौआ गांव के किसान प्राण सिंह माथुर ने बताया कि वे वर्षों से प्राकृतिक खेती कर रहे हैं और उन्होंने अमरूद की “बिलौआ-22” तथा “बिलौआ-रेड” जैसी नई किस्में विकसित की हैं, जिन्हें पेटेंट भी मिल चुका है. वे अब तक 50 हजार से अधिक किसानों को प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण दे चुके हैं.

वहीं देवरा गांव के किसान बृजेन्द्र रावत ने बताया कि उन्होंने रासायनिक खेती छोड़कर पूरी तरह प्राकृतिक खेती अपनाई है. उनकी पत्नी को इस क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पांच पुरस्कार मिल चुके हैं.

समन्वित खेती मॉडल बना आकर्षण का केंद्र

मुख्यमंत्री ने राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय में समन्वित कृषि प्रणाली और बहु-स्तरीय कृषि पद्धति इकाई का लोकार्पण भी किया. इस मॉडल में खेती, बागवानी, डेयरी, बकरी पालन, मुर्गी पालन, मधुमक्खी पालन, मशरूम उत्पादन और जैविक खाद निर्माण जैसी गतिविधियों को एक साथ जोड़ा गया है. इससे एक गतिविधि का अपशिष्ट दूसरी गतिविधि के लिए उपयोगी बन जाता है, जिससे लागत कम होती है और किसानों को आय के कई स्रोत मिलते हैं.

सड़क सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण का भी दिया संदेश

कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने करीब 50 लोगों को हेलमेट वितरित किए और सभी से सुरक्षित वाहन चलाने की अपील की. उन्होंने “एक पेड़ मां के नाम” अभियान के तहत आम का पौधा भी लगाया और प्रदेशवासियों से अधिक से अधिक पौधे लगाने तथा उनकी देखभाल करने का आग्रह किया.

कृषि विश्वविद्यालय परिसर में बने बहुउद्देश्यीय तालाब का निरीक्षण करते समय मुख्यमंत्री ने तालाब में दाने डालकर बतखों को बुलाया, जो तुरंत उनके पास आ गईं. यह तालाब समन्वित कृषि प्रणाली का हिस्सा है, जहां वर्षा जल संरक्षण, मछली पालन, बतख पालन और मुर्गी पालन को एक साथ जोड़ा गया है. इस मॉडल को किसानों के लिए टिकाऊ और लाभकारी कृषि का बेहतरीन उदाहरण बताया गया.

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