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मन का रेडियो बजने दे ज़रा : प्रो. मनोज कुमार

मन का रेडियो बजने दे ज़रा: राष्ट्रीय प्रसारण दिवस 23 जुलाई, 1927 पर विशेष आलेख...

राष्ट्रीय प्रसारण दिवस National Broadcasting Day की सभी रेडियो प्रेमी को शुभकामनाएं। ऐसे खूबसूरत अवसर पर यादें पुरानी ताज़ा हो जाती हैं। रेडियो से मेरा रिश्ता साल 1983 से आकाशवाणी रायपुर से शुरू हुआ। तब युववाणी प्रोग्राम हमारे कमल भइया (कमल शर्मा) के नियंत्रण में था। यह वक्त जोश और उत्साह का था लेकिन रेडियो की तमीज लेशमात्र नहीं थी। कमल भैया ने ट्रेनिंग दी और मेरा पहला प्रोग्राम सम्हाल लिया। कुछ सीख, कुछ डांट मिर्ज़ा मसूद भाई साहब से मिला।

इसके बाद आकाशवाणी भोपाल से जुड़ गया। तब प्रकाश शुजालपुरकर से परिचय हुआ। यहीं सुषमा तिवारी दीदी एवं पुष्पा तिवारी दीदी से आत्मीय रिश्ता बना। यहां सीखने वाले गुरु प्रभु जोशी मिले। बातों ही बातों में सहजता से मुझे रेडियो नाटक एवं कहानी से रेडियो रूपांतरण करना सिखा दिया। 15-15 मिनिट की पचास लघु नाटक लिखवाया। इन नाटकों की मूल प्रति आज भी मेरे पास सुरक्षित है। आकाशवाणी भोपाल में हिंदी अधिकारी रहे यादवजी एवं राजीव श्रीवास्तव ने खूब सहयोग किया।

समय बदला लोग बदले लेकिन हर दौर में आकाशवाणी के साथ मेरा रिश्ते और गहराता गया। तब समाचार संपादक संजीव शर्मा और सीनियर प्रोग्राम ऑफिसर राजेश भट्ट के साथ काम करते हुए हमेशा लगा कि आकाशवाणी प्रोग्राम का हिस्सा हूं। संयुक्त, दीपा, पूर्वा, राशिद भाई और रानू का भी स्नेहिल सहयोग मिला। लीलाधर मंडलोई जी तब आकाशवाणी के निदेशक थे। उनकी देखरेख में कई प्रोग्राम किया। अब पूजा वर्धन जी भी उसी आत्मीयता के साथ जब तब बुला लेती हैं। मसला यह कि मेरी तबियत ख़राब होने पर पूजा जी रेगुलर अपडेट लेती रहीं। ऐसे में आकाशवाणी परिवार से खुद को अलग कैसे समझूं।

इस बीच मध्य प्रदेश शासन की नवाचारी संस्था वन्या सामुदायिक रेडियो की स्थापना कर रही थी। तबके एमडी और बड़े भाई तुल्य श्रीराम तिवारी ने बतौर रेडियो समन्वयक मुझे जोड़ लिया। कुल जमा 8 सामुदायिक रेडियो स्टेशन स्थापित करने और संचालन का अनुभव मिला। ख़ास बात यह थी कि यह सभी रेडियो स्टेशन लोकल डायलॉग में प्रोग्राम बनाते थे। बेहतर संचालन और समन्वय की दृष्टि से प्रदेश की परिक्रमा करने का भी अवसर मिला।
प्रसारण की दुनियां में एक और टर्निग प्वाइंट आया जब मुझे तब के कुलपति जगदीश उपासने जी ने MCU में पहले रेडियो सलाहकार का दायित्व दिया। इस समय प्रो. संजय द्विवेदी कुलसचिव हुआ करते थे। यहां शुरू हुआ रेडियो कर्मवीर की स्थापना की कार्यवाही। पेपरवर्क पूरा हुआ और आगे की कार्यवाही होती कि प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हो गया। 18 माह के लिए सब कार्यवाही थम गई।

अब MCU के नए कुलपति बनकर प्रो. केजी सुरेश आए। कुछ पुराना दोस्ताना परिचय था। बधाई देने और चाय पीने पहुंचा तब बातों ही बातों में उन्होंने MCU में सामुदायिक रेडियो शुरू करने की बात कही। इस पर मैने पूरी कार्यवाही का विवरण बताया तो वे हक्के बक्के रह गए। तबके प्रशासन ने उन्हें अंधेरे में रख कर रेडियो के लिए नई प्रक्रिया शुरू करने की बात कही थी। कुलपति ने तत्काल कमेटी का गठन किया और मुझे उसका एक्सपर्ट के रूप में नामित किया। आखिरकार वह दिन आ ही गया जब रेडियो कर्मवीर बजने लगा। यहां भी डॉ. संजीव गुप्ता, प्रो. आशीष जोशी एवं अनुज डॉ. परेश उपाध्याय का खूब सहयोग मिला। MCU के इलेक्ट्रॉनिक डिपार्टमेंट में रेडियो अध्यापन के लिए मुझे एडजंक्ट प्रोफेसर नियुक्त किया गया। सुख तो यह था कि स्टूडेंट्स के बीच ,”मनोज सर रेडियो वाले” कहलाने लगा। सामुदायिक रेडियो पर हिंदी में मेरी किताब साल 2016 में आ चुकी है।

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