सुकमा/नवीन कश्यप/खबर डिजिटल/ सुकमा जिले के गहरी जंगलों में लंबे समय तक सक्रिय रहे 27 माओवादी, जिनमें 10 महिलाएं शामिल हैं, उन्होंने पुलिस अधीक्षक कार्यालय में हथियार रहित आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने का ऐतिहासिक कदम उठाया। यह सिर्फ आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि हिंसा के अंधकार से उम्मीद की नई किरण की कहानी है। इस अवसर की खासियत यह रही कि इनमें से कई वरिष्ठ और 50 लाख रुपये के इनामी ओयाम लखमू जैसे कमांडर भी शामिल हैं। आत्मसमर्पित माओवादी पीएलजीए बटालियन नंबर 01, रिजनल मिलिट्री कम्पनी और कई अग्र संगठनों में सक्रिय रहे थे। इनमें युवा से लेकर वरिष्ठ सदस्य भी हैं, जिन्होंने संगठन में शामिल होकर वर्षों तक हिंसा और भय का माहौल बनाया।
एसपी किरण चव्हाण ने दी जानकारी
पुलिस अधीक्षक किरण चव्हाण ने कहा – ‘आज 27 माओवादी संगठन छोड़कर समाज में लौट रहे हैं। यह आत्मसमर्पण पुलिस और सुरक्षा बलों की रणनीति, शासन की पुनर्वास नीति और स्थानीय समुदाय के सहयोग का परिणाम है। ये लोग अब विकास, शिक्षा और जीवन के नए अवसरों को अपनाकर समाज में योगदान देंगे।’ आत्मसमर्पित माओवादी छत्तीसगढ़ शासन की ‘नक्सलवादी आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति 2025’ और ‘नियद नेल्ला नार’ योजना से प्रेरित हुए हैं। लंबे समय तक जंगलों में सक्रिय रहने वाले इन लोगों ने देखा कि हिंसा और अमानवीय विचारधारा उन्हें और स्थानीय लोगों को नुकसान पहुंचाती है।
सुरक्षा बलों की रही महत्वपूर्ण भूमिका
प्रक्रिया में डीआरजी, जिला बल, सीआरपीएफ, कोबरा 203 और एसटीएफ की सक्रिय भूमिका रही। इन सुरक्षा बलों ने महीनों तक संवाद, भरोसा और लगातार कैंप स्थापित कर सुरक्षा का माहौल तैयार किया। आत्मसमर्पित माओवादी अब 50-50 हजार रुपये प्रोत्साहन राशि और अन्य सुविधाओं के साथ समाज में लौटेंगे। इनमें से कई ऐसे युवा हैं जिन्होंने संगठन में शामिल होने से पहले शिक्षा प्राप्त की थी और अब अपने गांव लौटकर रोजगार और सामाजिक विकास में योगदान देने की तैयारी कर रहे हैं।
आत्मसमर्पण के मुख्य बिंदु:
कुल 27 माओवादी (17 पुरुष, 10 महिला) ने आत्मसमर्पण किया।
50 लाख रुपये के ईनाम में से प्रमुख – ओयाम लखमू (10 लाख), 3 माओवादी पर 8-8 लाख।
आत्मसमर्पण पीएलजीए, रिजनल मिलिट्री और अग्र संगठन के सदस्यों द्वारा किया गया।
शासन की नई पुनर्वास नीति और लगातार बढ़ते सुरक्षा प्रभाव ने निर्णय प्रभावित किया।
सुकमा अब हिंसा से शांति की ओर बढ़ते बस्तर का प्रतीक बन रहा है, और यह आत्मसमर्पण उस बदलाव की दिशा में एक प्रेरक मिसाल है।


