भारत को ऊर्जा और खनिजों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने के लिए अपने विशाल प्राकृतिक संसाधनों की क्षमता का उपयोग करना होगा और उद्यमियों को बड़े स्तर पर काम करने की स्वतंत्रता देनी होगी। वेदांता के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने यह बात कहते हुए चेतावनी दी कि भू-राजनीतिक संघर्ष भारत की कच्चे माल के आयात पर निर्भरता को उजागर कर रहे हैं।
अग्रवाल ने कहा, “यह देखना दुखद है कि भारत उन युद्धों के प्रतिकूल प्रभाव झेल रहा है जिनसे हमारा कोई संबंध नहीं है।” उन्होंने कहा कि वैश्विक व्यवधानों का असर कमोडिटी की कीमतों और सप्लाई चेन पर पड़ता है। उन्होंने कहा, “हम अपने तेल का लगभग 90%, तांबे का 95% और सोने का 99.5% आयात करते हैं, जबकि प्रकृति ने भारत को दुनिया की बेहतरीन भू-वैज्ञानिक संपदा दी है।”
खनिज, धातु और तेल उद्योग में चार दशकों से अधिक के अनुभव का हवाला देते हुए अग्रवाल ने कहा कि यदि भारत अपने प्राकृतिक संसाधनों का प्रभावी ढंग से विकास करे तो आयात पर निर्भरता कम की जा सकती है और साथ ही रोजगार, उद्योग और निर्यात के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
अपने उद्यमी सफर को याद करते हुए अग्रवाल ने कहा कि वह 19 वर्ष की आयु में बिहार से मुंबई आए थे और वहीं से उन्होंने वेदांता की शुरुआत की। वर्षों के दौरान कंपनी ने हिंदुस्तान जिंक, बाल्को, केयर्न इंडिया के तेल और गैस कारोबार तथा सेसा गोवा आयरन ओर जैसी प्रमुख परिसंपत्तियों का अधिग्रहण किया, जिसका उद्देश्य उत्पादन को बड़े स्तर पर बढ़ाना था।
अग्रवाल के अनुसार, इन परिसंपत्तियों में वेदांता द्वारा किया गया संचालनात्मक बदलाव यह दिखाता है कि निजी उद्यम क्या हासिल कर सकते हैं। उन्होंने कहा, “हमने जिंक का उत्पादन दस गुना और एल्युमिनियम का उत्पादन बीस गुना बढ़ाया। इसके परिणामस्वरूप इन वैल्यू चेन के आसपास 1,000 से अधिक कंपनियाँ विकसित हुईं।”उन्होंने यह भी बताया कि पिछले दस वर्षों में वेदांता ने ₹4.5 लाख करोड़ का योगदान राष्ट्रीय राजकोष में दिया है।
अग्रवाल ने भविष्य के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य भी साझा किए। तेल और गैस क्षेत्र में कंपनी का लक्ष्य प्रतिदिन 10 लाख बैरल उत्पादन का है, जबकि आयरन ओर में वे 10 करोड़ टन उत्पादन का लक्ष्य देखते हैं, जो आज के भारत के कुल उत्पादन का लगभग एक-तिहाई होगा।
उन्होंने कहा कि भारत को वैश्विक स्तर के खनन चैंपियनों की आवश्यकता है। “भारत के लिए वेदांता वैसा होना चाहिए जैसा ऑस्ट्रेलिया के लिए रियो टिंटो और बीएचपी या ब्राज़ील के लिए वेल हैं। और भारत में कई और वेदांता बनने चाहिए।”
हालांकि, अग्रवाल ने जोर दिया कि इस क्षेत्र के विकास के लिए नीतिगत सुधार और नियामकीय सोच में बदलाव बेहद जरूरी है। उन्होंने सरल नियमों, व्यवसायों पर अधिक भरोसे और लंबी अनुमोदन प्रक्रियाओं तथा मुकदमेबाजी के बजाय सेल्फ–सर्टिफिकेशन और ऑडिट आधारित व्यवस्था अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने कहा, “प्रणाली को व्यवसायों के लिए बाधाएँ पैदा करना बंद करना चाहिए। उद्यमियों को पहचान और सम्मान मिलना चाहिए, और संदेह का लाभ भी उन्हें ही दिया जाना चाहिए।”
पिछले छूटे अवसरों का उल्लेख करते हुए अग्रवाल ने मध्य प्रदेश में रियो टिंटो द्वारा शुरू की गई हीरा खदान परियोजना का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जटिल नियामकीय प्रक्रियाओं के कारण कंपनी को बाहर निकलना पड़ा, जिससे भारत के लिए वैश्विक हीरा उत्पादन केंद्र बनने का अवसर खो गया।
अग्रवाल ने इस वर्ष अपने परिवार पर आए एक व्यक्तिगत दुखद हादसे का भी जिक्र किया और बताया कि उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों से प्रेरणा मिली, जिन्होंने उनसे मजबूत रहने और भारत के लिए महत्वपूर्ण कार्य जारी रखने को कहा।
अपने दादा-दादी से मिली सीख को याद करते हुए अग्रवाल ने कहा कि संपत्ति का उपयोग अंततः समाज के लिए होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत के प्राकृतिक संसाधन क्षेत्र का विकास रोजगार सृजन, महिला सशक्तिकरण और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
उन्होंने कहा, “यह क्षेत्र भारत और दुनिया में राष्ट्र निर्माण के लिए राजकोष को सबसे अधिक राजस्व देता रहा है। यदि हम इसकी पूरी क्षमता को खोल दें, तो यह भारत को विकसित राष्ट्र बनाने में मदद करेगा। आइए भारत और भारतीयों को गर्व महसूस कराएं।”


