Petrol Diesel Price Hike: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का सीधा असर अब भारतीय आम आदमी की जेब पर पड़ने वाला है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग ने भारतीय सरकारी तेल कंपनियों की नींद उड़ा दी है। ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, तेल कंपनियों के लिए अब पेट्रोल और डीजल बेचना भारी घाटे का सौदा साबित हो रहा है।
कितना हो रहा है नुकसान?
कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों के बावजूद देश में लंबे समय से रिटेल कीमतों में बदलाव नहीं हुआ है। इसका नतीजा यह है कि तेल कंपनियों को प्रति लीटर डीजल पर लगभग 35 रूपए का बड़ा नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसके अलावा पेट्रोल की बिक्री पर भी करीब 18 रूपए प्रति लीटर का घाटा हो रहा है। पिछले महीने तक यह घाटा 2,400 करोड़ प्रतिदिन था, जो एक्साइज ड्यूटी में कटौती के बाद फिलहाल 1,600 करोड़ प्रतिदिन के स्तर पर बना हुआ है।
कच्चे तेल का ‘कड़वा’ सच
साल 2026 की शुरुआत में कच्चे तेल की कीमतें 70 डालर प्रति बैरल तक गिर गई थीं, जिससे राहत की उम्मीद जगी थी। लेकिन मिडिल ईस्ट के ताजा हालातों ने बाजी पलट दी है। वर्तमान में ब्रेंट क्रूड एक बार फिर 100 डालर प्रति बैरल के स्तर को पार कर चुका है। अप्रैल 2022 से कीमतों को स्थिर रखने वाली कंपनियों के लिए अब यह बोझ सहना नामुमकिन होता जा रहा है।
चुनाव के बाद बढ़ेंगे दाम?
मैक्वेरी ग्रुप की ताज़ा रिपोर्ट ने आम जनता की चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव खत्म होते ही कीमतों को बढ़ाया जा सकता है। माना जा रहा है कि अप्रैल के अंत या मई की शुरुआत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में धीरे-धीरे या एकमुश्त बड़ी बढ़ोत्तरी की जा सकती है। हालांकि सरकार ने एक्साइज ड्यूटी घटाकर घाटे को संतुलित करने की कोशिश की है, लेकिन बढ़ता अंतरराष्ट्रीय दबाव इसे और अधिक समय तक रोक नहीं पाएगा।
आम आदमी पर असर
अगर तेल की कीमतों में इजाफा होता है, तो इसका सीधा असर माल ढुलाई और ट्रांसपोर्टेशन पर पड़ेगा, जिससे खाद्य पदार्थों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में भी उछाल आने की संभावना है।


