डिंडौरी/शैलेश नामदेव/खबर डिजिटल/ अमरकंटक के जंगलों में साल बोरर का कहर नजर आ रहा है। 5 हजार से अधिक साल वृक्ष खोखले हो गए हैं, लेकिन जिम्मेदारों को इसकी कितनी चिंता है, ये देखने वाली बात है कि वन विभाग कितनी चिंता कर रहा है।
हरी पट्टी पर मंडराता खतरा
अमरकंटक और छत्तीसगढ़ सीमा से लगे डिंडौरी के घने साल जंगल एक बार फिर गंभीर संकट में हैं। वर्षों बाद फिर से साल बोरर कीट का भारी प्रकोप दिखाई देने लगा है। हालात इतने भयावह हैं कि वन विभाग ने 5000 से भी अधिक पेड़ों को खोखला पाया है, जिन्हें काटने की प्रक्रिया तक शुरू करनी पड़ सकती है। मां नर्मदा के उद्गम स्थल के चारों ओर का यह हराभरा क्षेत्र अब धीरे-धीरे पीला और सूखा दिखने लगा है।
1998 की महामारी लौटने के संकेत
साल 1998 में इन जंगलों में साल बोरर महामारी ने भारी तबाही मचाई थी। उस वक्त स्थिति इतनी बिगड़ी कि सरकार को ग्रामीणों से कीड़े मरवाकर किलो के भाव उनके सिर खरीदने पड़े थे। आज वही दहशत दोबारा लौटती दिखाई दे रही है। इस बार भी पेड़ों की छाल में छोटे-छोटे छिद्र, नीचे गिरता बुरादा और सूखती टहनियां, खतरे की घंटी बजा रहे हैं।
जंगल की जमीनी तस्वीर
ग्रामीण दल सिंह मार्को बताते हैं कि “जंगलों के बीच जहां भी जाइए, साल के पेड़ खोखले नजर आ रहे हैं। कई पेड़ सूखकर खड़े रह गए हैं, जिन्हें देखकर डर लगता है कि आने वाले दिनों में यह पूरा जंगल बीमार हो सकता है।” चेकपोस्ट में पदस्थ वनकर्मी जयप्रकाश पाठक की चिंताएं भी यही कहती हैं कि “छाल से लगातार बुरादा गिर रहा है, यह कीट का साफ संकेत है। अगर समय रहते रोकथाम नहीं हुई, तो नुकसान और बढ़ सकता है।”
वैज्ञानिक टीम की रिपोर्ट पर टिकी उम्मीदें
स्थिति गंभीर होने पर TFRI (ट्रॉपिकल फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट), जबलपुर की विशेषज्ञ टीम मौके का निरीक्षण कर चुकी है।
टीम ने पेड़ों के नमूने एकत्र किए हैं और कीट के फैलाव की सीमा को मापा है। अब विभाग को उनकी विस्तृत रिपोर्ट और सुझाव का इंतजार है।
वन विभाग की सफाई और चुनौतियां
वन विभाग के SDO सुरेन्द्र जाटव का कहना है – “साल बोरर कीट बेहद तेजी से फैलने वाले कीट हैं। इन्हें नियंत्रित करना उतना ही कठिन है। अभी तक लगभग 5000 साल वृक्ष चिन्हित किए गए हैं। TFRI की सलाह के बाद आगे की कार्यवाही होगी। विभाग पेड़ों के बचाव के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है।”
जंगल की सांसें और हमारा भविष्य
साल वृक्ष अमरकंटक के जंगलों की रीढ़ हैं। अगर यह प्रकोप समय रहते नहीं थामा गया, तो न केवल पेड़, बल्कि इन जंगलों पर निर्भर वन्यजीव, पर्यावरण और स्थानीय जनजीवन, सब प्रभावित होंगे। प्राकृतिक संतुलन की रक्षा अब विभाग, वैज्ञानिकों और समाज की साझा जिम्मेदारी बन चुकी है।


