P?c1=2&c2=41463588&cv=3.9
Friday, April 17, 2026
No menu items!
spot_img
Homeमध्यप्रदेशDindori News : पुल नहीं बना तो ग्रामीणों ने चंदा कर नदी...

Dindori News : पुल नहीं बना तो ग्रामीणों ने चंदा कर नदी पर तैयार किया रास्ता.. हर साल श्रमदान से बनता है अस्थायी मार्ग

ग्रामीणों को पुल की आस

डिंडौरी/शैलेश नामदेव/खबर डिजिटल/ विकास योजनाओं और सरकारी दावों के बीच डिंडोरी जिले की सीमा पर बहने वाली बूढ़नेर नदी आज भी ग्रामीणों की सबसे बड़ी मजबूरी बनी हुई है। नदी पर स्थायी पुल न होने के कारण वर्षों से ग्रामीण हर साल चंदा और श्रमदान के सहारे अस्थायी मार्ग तैयार करने को मजबूर हैं।

हर वर्ष चंदा, हर वर्ष श्रमदान
ग्रामीणों ने बताया कि नदी पर आवागमन बनाए रखने के लिए हर साल प्रत्येक परिवार से लगभग एक-एक हजार रुपये का चंदा इकट्ठा किया जाता है। इसके बाद सामूहिक श्रमदान के माध्यम से नदी पर पत्थर, मिट्टी और अन्य संसाधनों से अस्थायी रास्ता तैयार किया जाता है। यह कार्य गांव के युवाओं, बुजुर्गों और किसानों की सहभागिता से पूरा होता है।

बरसात में बह जाता है रास्ता, फिर शुरू होती है जद्दोजहद
बरसात के मौसम में जब नदी उफान पर आती है, तो यह अस्थायी मार्ग पूरी तरह बह जाता है और गांव का संपर्क टूट जाता है। जैसे ही बारिश थमती है और जलस्तर कम होता है, ग्रामीण फिर से एकजुट होकर रास्ता बनाने में जुट जाते हैं। यह सिलसिला वर्षों से लगातार दोहराया जा रहा है।

बाढ़ के बाद फिर बनाते हैं रास्ता
अस्थायी मार्ग बनने के बाद केवल बड़े वाहन ही नहीं, बल्कि बाइक और छोटे वाहन भी इसी रास्ते से गुजरते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इस मार्ग के कारण उन्हें समय और दूरी—दोनों की बचत होती है। यदि यह रास्ता न बने, तो उन्हें करीब 40 किलोमीटर का अतिरिक्त चक्कर लगाना पड़ता है, जबकि अस्थायी मार्ग से दूरी घटकर लगभग 12 किलोमीटर रह जाती है।

पुल की मांग, पर समाधान नहीं
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार पुल निर्माण की मांग को लेकर जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और प्रशासन के समक्ष अपनी बात रखी, लेकिन आज तक स्थायी समाधान नहीं मिल पाया। पुल निर्माण की फाइलें केवल कागजों में सिमट कर रह गई हैं।

मजबूरी का नाम श्रमदान
ग्रामीणों का दर्द यह है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन जब वर्षों तक उनकी समस्या नहीं सुनी गई, तो उन्होंने खुद ही रास्ता बना लिया। उनका कहना है कि यह श्रमदान उनकी इच्छा नहीं, बल्कि मजबूरी है—ताकि बच्चों की पढ़ाई, इलाज और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी हो सकें।

सबसे बड़ा सवाल
जब ग्रामीण हर साल अपने पैसों और मेहनत से नदी पर रास्ता बना सकते हैं, तो सरकार आज तक स्थायी पुल क्यों नहीं बना सकी? यह सवाल आज भी बूढ़नेर नदी के बहते पानी के साथ-साथ ग्रामीणों की आंखों में तैर रहा है।

सम्बंधित ख़बरें

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -spot_img

लेटेस्ट