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डिंडौरी: कला, संस्कृति और कौशल का संगम… 15-दिवसीय गोंडी पेंटिंग कार्यशाला का भव्य आगाज

चन्द्रविजय महाविद्यालय में आयोजन

डिंडौरी/शैलेश नामदेव/खबर डिजिटल/ आधुनिकता के इस दौर में जहां पारंपरिक कलाएं हाशिये पर जाती नजर आती हैं, वहीं चन्द्रविजय महाविद्यालय डिंडौरी ने भारतीय सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और उसे रोजगार से जोड़ने की दिशा में एक सराहनीय पहल की है। भारत सरकार की महत्वाकांक्षी योजना प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा अभियान (PM-USHA) के कंपोनेंट-3 के अंतर्गत महाविद्यालय में “इंडियन आर्ट एंड कल्चर: गोंडी पेंटिंग” विषय पर 15-दिवसीय गहन प्रशिक्षण कार्यशाला का गरिमामय शुभारंभ किया गया। यह आयोजन न केवल कला प्रेमियों के लिए उत्साहजनक है, बल्कि नई शिक्षा नीति (NEP) के उन उद्देश्यों को भी साकार करता है, जो भारतीय ज्ञान परंपरा, कौशल विकास और आत्मनिर्भरता पर विशेष बल देते हैं।

दीप प्रज्ज्वलन के साथ रचनात्मक यात्रा की शुरुआत
कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती की वंदना एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. संतोष धुर्वे ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में जनजातीय कला के वैश्विक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि “गोंडी पेंटिंग केवल रेखाओं और रंगों का संयोजन नहीं, बल्कि यह प्रकृति और मानव के अटूट संबंध का जीवंत दस्तावेज है। ऐसी कार्यशालाएं विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़कर उनमें आत्मविश्वास का संचार करती हैं।”

रोजगार और कौशल संवर्धन पर विशेष फोकस
पीएम-ऊषा योजना के सह-समन्वयक डॉ. रवि सिंह ने कार्यशाला की उपयोगिता बताते हुए कहा कि इस प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों की रचनात्मक प्रतिभा को व्यावसायिक स्वरूप देना है। उन्होंने बताया कि गोंडी कला की बारीकियां सीखकर छात्र फ्रीलांस कलाकार, इंटीरियर डिजाइनर अथवा कला प्रशिक्षक के रूप में करियर बना सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गोंडी पेंटिंग की बढ़ती लोकप्रियता विद्यार्थियों के लिए आर्थिक स्वावलंबन के नए अवसर खोलेगी।

प्रशिक्षण की रूपरेखा और विशेषज्ञ मार्गदर्शन
सेडमैप (CEDMAP) के समन्वयकएस.के. शर्मा ने कार्यशाला की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि आगामी 15 दिनों में प्रतिभागियों को गोंडी कला का इतिहास, रंगों का चयन और संयोजन, पारंपरिक प्रतीकों का आधुनिक उपयोग, बाजार की मांग के अनुरूप कलाकृतियों का निर्माण, जैसे विषयों पर सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा।

संस्थागत सहयोग और विद्यार्थियों में उत्साह
कार्यक्रम को सफल बनाने में महाविद्यालय की वरिष्ठ प्राध्यापक एवं विधा प्रभारी डॉ. अनीता मेश्राम की महत्वपूर्ण भूमिका रही। साथ ही सुश्री पूजा धुर्वे, श्री दानियल प्रसाद एवं योगेश वालरे के सक्रिय सहयोग से प्रथम दिन ही विद्यार्थियों में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। कार्यशाला में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने पंजीयन कराया है, जो युवाओं के बीच पारंपरिक कला के प्रति बढ़ते रुझान को दर्शाता है।

आभार प्रदर्शन
कार्यक्रम के समापन सत्र में डॉ. अनीता मेश्राम ने सभी अतिथियों, मीडिया प्रतिनिधियों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने विश्वास जताया कि कार्यशाला के समापन के बाद प्रतिभागी न केवल एक कुशल कलाकार के रूप में उभरेंगे, बल्कि गोंडी कला के संवाहक और संरक्षक के रूप में भी समाज में अपनी पहचान बनाएंगे।

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