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Friday, April 17, 2026
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Dindori News : मां नर्मदा के आंचल में नशे का जश्न!… नाबालिगों लड़कियों का ‘शराबी बर्थडे’ वीडियो वायरल

कटघरे में शराबबंदी और निगरानी तंत्र

डिंडौरी/शैलेश नामदेव/खबर डिजिटल/नर्मदा तट की पवित्रता और मर्यादा पर उस समय गंभीर सवाल खड़े हो गए, जब डिंडौरी के प्रसिद्ध डेम घाट का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। वीडियो में दो नाबालिग लड़कियाँ पवित्र नर्मदा नदी के किनारे केक काटते हुए शराब पीती स्पष्ट दिखाई दे रही हैं। यह दृश्य न सिर्फ कानून का उल्लंघन है, बल्कि धार्मिक आस्था और प्रशासनिक दावों की खुली अवहेलना भी है।

नर्मदा तट पर जन्मदिन या कानून का मजाक?
वायरल वीडियो सामने आते ही शहर में हड़कंप मच गया। श्रद्धालुओं और स्थानीय नागरिकों ने इसे मां नर्मदा की अवमानना बताते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी। सवाल उठने लगे कि धार्मिक घाट पर ऐसा कृत्य कैसे संभव हुआ और घाटों पर तैनात निगरानी तंत्र आखिर कहां था।

शराबबंदी के दावे बनाम जमीनी सच्चाई
मध्य प्रदेश सरकार द्वारा नर्मदा किनारे बसे धार्मिक क्षेत्रों को शराबमुक्त घोषित किया गया है। नियमों के अनुसार नर्मदा से 5 किलोमीटर के दायरे में शराब की दुकानें प्रतिबंधित हैं। इसके बावजूद डिंडौरी जिले में अवैध शराब की उपलब्धता और खुलेआम सेवन की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। यह घटना सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच गहरी खाई को उजागर करती है।

नाबालिगों तक शराब पहुंची कैसे?
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि नाबालिग लड़कियों के हाथ तक शराब पहुंची कैसे। क्या अवैध सप्लाई नेटवर्क सक्रिय है? क्या पुलिस और आबकारी विभाग की गश्त महज कागज़ों तक सीमित है? स्थानीय नागरिकों का कहना है कि नर्मदा घाटों पर अक्सर खाली शराब की बोतलें, नशेबाजों की भीड़ और अनुशासनहीनता देखी जाती है, लेकिन ठोस कार्रवाई के बजाय केवल औपचारिकता निभाई जाती है।

औपचारिक कार्रवाई या असली जवाबदेही?
वीडियो सामने आने के बाद आबकारी विभाग ने दोनों नाबालिगों की पहचान कर उन्हें परिजनों के सुपुर्द कर दिया। परंतु यह कार्रवाई केवल खानापूर्ति मानी जा रही है। असली मुद्दा उन लोगों की पहचान और सख्त दंड का है, जिन्होंने नाबालिगों तक शराब पहुंचाई और घाट जैसी पवित्र जगह पर नशे को संभव बनाया।

आस्था बचानी है तो सख्ती जरूरी
यदि प्रशासन वास्तव में नर्मदा तट को नशामुक्त और धार्मिक स्वरूप में बनाए रखना चाहता है, तो उसे अवैध शराब कारोबारियों, लापरवाह अधिकारियों और संरक्षण देने वाली पूरी श्रृंखला पर कठोर कार्रवाई करनी होगी। अन्यथा ऐसे वीडियो न सिर्फ आस्था को आहत करते रहेंगे, बल्कि कानून और प्रशासन की विश्वसनीयता भी लगातार सवालों के घेरे में आती जाएगी।

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