पश्चिम एशिया में जारी तनाव और युद्ध जैसे हालात का असर अब भारतीय बाजारों में भी दिखाई देने लगा है. खासतौर पर ड्राई फ्रूट कारोबार इससे प्रभावित हुआ है. ईरान और अफगानिस्तान जैसे देशों से आने वाले पिस्ता, अंजीर, खजूर और अन्य सूखे मेवों की आपूर्ति प्रभावित होने से बाजार में कीमतों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है.कारोबारियों के मुताबिक यदि मौजूदा हालात लंबे समय तक बने रहे तो आने वाले त्योहारों के दौरान ड्राई फ्रूट्स खरीदना उपभोक्ताओं के लिए और महंगा साबित हो सकता है. मांग और आपूर्ति के बीच बढ़ते अंतर का असर कीमतों पर साफ नजर आने लगा है.
पिस्ता और अंजीर की कीमतों में तेजी
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि पिस्ता की कीमतों में 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी देखी गई है. वहीं अंजीर भी पहले की तुलना में करीब 10 प्रतिशत महंगा हो चुका है. कुल मिलाकर कई प्रमुख ड्राई फ्रूट्स की कीमतों में 10 से 25 प्रतिशत तक का उछाल दर्ज किया गया है. इससे थोक और खुदरा दोनों बाजार प्रभावित हुए हैं. क्षेत्रीय तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों पर भी पड़ा है. कई समुद्री रास्तों और बंदरगाहों के प्रभावित होने से माल की आवाजाही धीमी हो गई है. शिपिंग खर्च, बीमा शुल्क और फ्रेट चार्ज में भी बढ़ोतरी हुई है. जो खेप पहले कम समय में भारत पहुंच जाती थी, अब उसे आने में काफी अधिक समय लग रहा है.
गुणवत्ता को लेकर भी बढ़ी चिंता
व्यापारियों की चिंता केवल कीमतों तक सीमित नहीं है. लंबे समय तक ट्रांजिट में फंसे रहने के कारण ड्राई फ्रूट्स की गुणवत्ता प्रभावित होने का खतरा भी बढ़ गया है. सूखे मेवों को सुरक्षित रखने के लिए नियंत्रित तापमान और विशेष भंडारण व्यवस्था की जरूरत होती है. देरी होने पर इनके स्वाद और गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है.
काजू और किशमिश के बाजार में फिलहाल राहत
हालांकि सभी ड्राई फ्रूट्स की स्थिति एक जैसी नहीं है. काजू और किशमिश की कीमतों में फिलहाल बड़ी बढ़ोतरी की संभावना कम बताई जा रही है. इसकी मुख्य वजह भारत में इनका पर्याप्त उत्पादन होना है. घरेलू उपलब्धता बेहतर रहने से इन उत्पादों के बाजार में फिलहाल संतुलन बना हुआ है.
त्योहारी सीजन में बढ़ सकती है परेशानी
विशेषज्ञों का मानना है कि असली चुनौती अगस्त और सितंबर से शुरू होने वाले त्योहारी सीजन में सामने आ सकती है. दिवाली और अन्य प्रमुख त्योहारों के दौरान ड्राई फ्रूट्स की मांग तेजी से बढ़ती है. यदि तब तक अंतरराष्ट्रीय सप्लाई सामान्य नहीं हुई तो कीमतों में और उछाल देखने को मिल सकता है. ऐसी स्थिति में बाजार की मांग पर भी असर पड़ सकता है और बिक्री में गिरावट आने की आशंका है.
सामान्य होने में लग सकता है लंबा समय
कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि भले ही क्षेत्रीय तनाव जल्द खत्म हो जाए, लेकिन आपूर्ति व्यवस्था को पूरी तरह पटरी पर लौटने में समय लगेगा. अनुमान है कि सप्लाई चेन को सामान्य होने में कम से कम 3 से 6 महीने का समय लग सकता है. तब तक बाजार में कीमतों का दबाव बना रह सकता है और उपभोक्ताओं को सूखे मेवों के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है.
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