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लापरवाही पड़ी भारी! कॉम्प्लेक्स विवाद में नगर निगम पर 67 करोड़ की कुर्की का खतरा

सौरभ श्रीवास्तव संवाददाता कटनी –रेलवे स्टेशन चौराहा के पास स्थित राजीव गांधी शॉपिंग कॉम्प्लेक्स का पुराना विवाद अब नगर निगम कटनी के लिए भारी संकट बनकर सामने आ गया है। करीब दो दशक पुराने इस मामले में आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल द्वारा वर्ष 2012 में ठेकेदार मेसर्स खुशीराम एंड कंपनी के पक्ष में 22 करोड़ 60 लाख रुपए का अवार्ड दिया गया था। नगर निगम ने इस फैसले को जिला न्यायालय से लेकर उच्च न्यायालय और अंततः सुप्रीम कोर्ट तक चुनौती दी, लेकिन हर स्तर पर निगम को हार का सामना करना पड़ा। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी निगम की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) खारिज कर दी गई, जिससे आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल का फैसला यथावत बना रहा।कुर्की वारंट तामील, निगम में मचा हड़कंपमामले में जबलपुर कॉमर्शियल कोर्ट द्वारा कुर्की वारंट जारी किए जाने के बाद बुधवार को उसकी तामीली की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। कटनी और जबलपुर न्यायालय की संयुक्त टीम नगर निगम कार्यालय पहुंची और लगभग 22.60 करोड़ रुपए की मूल राशि के साथ ब्याज मिलाकर करीब 67 करोड़ रुपए के कुर्की वारंट की तामील कराई। इस दौरान डिक्रीधारक कंपनी के पावर ऑफ अटॉर्नी किशोर वाधवानी भी मौजूद रहे। न्यायालय की टीम ने आयुक्त कार्यालय में अधिकारियों को नोटिस सौंपते हुए स्पष्ट किया कि निर्धारित समय में भुगतान नहीं होने पर आगे की कठोर कार्रवाई की जाएगी।2012 के अवार्ड के बाद भी नहीं हुआ भुगतानबताया जा रहा है कि आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल का फैसला वर्ष 2012 में ही आ गया था, लेकिन नगर निगम द्वारा समय पर राशि का भुगतान नहीं किया गया। लगातार अपील और कानूनी प्रक्रिया में देरी के कारण ब्याज बढ़ता गया और अब यह राशि करीब 67 करोड़ रुपए तक पहुंच गई है। इस पूरे घटनाक्रम ने नगर निगम के पूर्व और कुछ वर्तमान अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।शिकायत के बाद शासन ने दिए जांच के निर्देशइस मामले को लेकर नगर निगम के वरिष्ठ पार्षद मिथलेश जैन ने 15 अक्टूबर 2024 को मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव को विस्तृत शिकायत भेजी थी। शिकायत पर संज्ञान लेते हुए राज्य शासन ने नगरीय प्रशासन विभाग को उच्च स्तरीय जांच के निर्देश भी दिए थे।ऐसे शुरू हुआ था विवादजानकारी के मुताबिक नगर निगम ने रेलवे स्टेशन के बाहर पुराने रेस्ट हाउस की जमीन पीडब्ल्यूडी से लेकर प्रमोटर स्कीम के तहत एक वाणिज्यिक केंद्र विकसित करने की योजना बनाई थी। वर्ष 2000 में इस परियोजना का टेंडर जारी हुआ और 2001 में मेसर्स खुशीराम एंड कंपनी को निर्माण कार्य सौंप दिया गया। लेकिन वर्ष 2005 में विवाद शुरू हो गया, जब ठेकेदार ने आरोप लगाया कि अनुबंध के अनुसार उसे करीब 10 हजार वर्गफीट जमीन कम दी गई है।इसके बाद वैकल्पिक जमीन देने की प्रक्रिया शुरू हुई और मामला परिषद तक भी पहुंचा, लेकिन समाधान नहीं निकल सका। यही विवाद आगे चलकर कानूनी लड़ाई में बदल गया और मामला आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल तक पहुंच गया।रिव्यू पिटीशन भी नहीं दिला सकी राहतफैसले के बाद नगर निगम ने सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन भी दायर की, लेकिन उससे भी निगम को कोई राहत नहीं मिल सकी। अब अदालत के आदेश के बाद ठेकेदार को भुगतान सुनिश्चित कराने के लिए नगर निगम की संपत्तियों की कुर्की की प्रक्रिया शुरू होने की स्थिति बन गई है।निगम की वित्तीय स्थिति पर मंडराया संकटकरीब 67 करोड़ रुपए की देनदारी सामने आने के बाद नगर निगम की वित्तीय स्थिति पर गंभीर संकट मंडराने लगा है। न्यायालय से जारी कुर्की वारंट की सूचना मिलते ही नगर निगम के अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों में हड़कंप की स्थिति बन गई है, वहीं पूरे मामले में प्रशासनिक लापरवाही और कमजोर कानूनी पैरवी को मुख्य वजह माना जा रहा है।

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