Tuesday, November 3, 2026
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शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से युक्त होकर धरती पर अमृत वर्षा करता है

शरद पूर्णिमा
दोहे

चंचल किरणें चाॅंद की ,बरस सुधा रस धार।
बूंद खीर में जा गिरी, चख कर जाने सार।‌।

खुशी मिलन की रात है, प्रेमी मिलते साथ।
खाते कसमें प्यार की, थामें दोनों हाथ।।

आज उजाला हो गया, देख चाॅंद का रंग।
खोया प्रेमी प्रेम में, देखें गोरी दंग।।

रास रचाऍं कृष्ण जी, सखियाॅं नाचे खूब।
राधा देखे रूठती, कृष्ण मनाते डूब।।

कमल विराजे मातु है, हाथ सुशोभित फूल।
धन वर्षा होती रहें, क्षमा करें माॅं भूल।।

चाॅंद चकोरी चाॅंदनी, शोभ रहा संसार ।
चाॅंद निहारें रूप भू , अनुपम हो श्रृंगार।।

बरस सुधा रस चाॅंद से,शरद पूर्णिमा रात।
दमक रही है चाॅंदनी, धरती की सौगात।।

    शैलेन्द्र पयासी, साहित्यकार 
   विजयराघवगढ़,कटनी, एमपी
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