भोपाल/खबर डिजिटल/ मध्यप्रदेश की बिजली कंपनी में कथित तौर पर एक बड़े प्रशासनिक खेल की तैयारी की चर्चा है। अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, एक वरिष्ठ अधिकारी के सेवानिवृत्त होने के बाद उनकी दोबारा नियुक्ति का रास्ता अभी से तैयार किया जा रहा है। बताया जा रहा है कि जिन अधिकारी की पुनर्नियुक्ति की चर्चा है, वे पहले भी विभिन्न कारणों से सवालों के घेरे में रहे हैं। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। यदि पुनर्नियुक्ति होती है, तो इससे जुड़े निर्णय और प्रक्रिया पर कई सवाल खड़े हो सकते हैं। संबंधित विभाग या अधिकारी का पक्ष सामने आने के बाद स्थिति और स्पष्ट होगी।
प्रशासनिक नीति की धज्जियां उड़ रही
एमपी पावर मैनेजमेंट कंपनी कहने को तो प्रदेश की विद्युत कंपनियों की होल्डिंग कंपनी है लेकिन इसकी कार्यप्रणाली अज़ब है गज़ब है। पावर मैनेजमेंट कंपनी समस्त विद्युत कंपनियों के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत और नीतियां बनाती है लेकिन कंपनी की कार्यप्रणाली इन दिनों कुछ ऐसी है कि उससे मानव संसाधन और प्रशासनिक नीति की धज्जियां उड़ रही हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि मध्यप्रदेश पावर ट्रांसमिशन कंपनी में पिछले कई वर्षों से किसी अभियंता या कर्मचारी को रिटायरमेंट के पश्चात तो संविदा नियुक्ति में रखा गया और न ही आउट सोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से पुनर्नियुक्ति दी गई लेकिन पावर मैनेजमेंट कंपनी अब नया प्रयोग करने जा रही है कि वह दूसरी कंपनी के मूल लॉ आफिसर को अपनी कंपनी में आउट सोर्सिंग एजेंसी के जरिए पुनर्नियुक्ति दे रही है।
पुनर्नियुक्ति को लेकर उठे सवाल
पावर मैनेजमेंट कंपनी ने इस पिछले दरवाजे की नीति से गत वर्ष एक हार्टिकल्चरिस्ट और जूनियर इंजीनियर को पुनर्नियुक्ति दी थी। मजेदार बात यह है कि हार्टिकल्चरिस्ट बागबानी के स्थान पर व्हीकल सेक्शन की गाड़ियों के पेट्रोल-डीजल की व्यवस्था करता था और आउट सोर्सिंग आधार पर किराये से लिए गए वाहनों के बिल पास करता था। वहीं जूनियर इंजीनियर ने साल भर सिर्फ फाइलों का रखरखाव ही किया।
इन कामों को करने के लिए पावर मैनेजमेंट कंपनी ने इन दोनों अधिकारियों के वेतन पर लाखों रूपये व्यय किये। सूत्रों का कहना है कि पावर मैनेजमेंट कंपनी में कार्यरत सीनियर लॉ आफिसर के रिटायरमेंट पर जब उनके कार्यालय प्रमुख मुख्य मह़मह़ाप्रबंधक ने जब सीनियर लॉ आफिसर को संविदा के आधार पर नियुक्ति का प्रस्ताव मानव संसाधन और प्रशासन विभाग को भेजा तब इस प्रस्ताव को कचड़े की टोकरी में यह कहकर डाल दिया गया कि कंपनी में लॉ आफिसर की कोई जरूरत नहीं है।
डेप्यूटेशन और प्रशासनिक भूमिका पर भी सवाल
पावर ट्रांसमिशन कंपनी के जिन मूल लॉ आफिसर को पावर मैनेजमेंट कंपनी में पुनर्निुयक्ति दी जा रही है वह साल 2012 से विद्युत कंपनियां बनने के बाद अपनी मूल कंपनी में कभी काम करने के लिए नहीं गये। 14 सालों तक वह जोड़ तोड़ करके पावर मैनेजमेंट कंपनी में डेप्यूटेशन आधार पर पदस्थ रहे। यहां पहले डीजीएम प्रशासन और बाद में जीएम प्रशासन का पद हथिया लिया। इसके बाद वे पावर मैनेजमेंट कंपनी के व्हीकल सेक्शन और सुरक्षा विभाग के सर्वोसर्वा बन गए। सेंट्रल स्पोटर्स एन्ड कल्चरल कमेटी में सेक्रेटरी का पद स्वयं नोटशीट लिखकर काबिज कर लिया।
जीएम एडमिनिस्ट्रेशन पद में रहते हुए इस लॉ आफिसर ने अपनी भतीजी को पावर मैनेजमेंट कंपनी के सिविल विभाग में आउट सोर्सिंग आधार पर जूनियर इंजीनियर के पद नियुक्त करवाया। अब इस लॉ आफिसर ने संविदा व आउट सोर्सिंग आधार पर स्वयं पिछले दरवाजे से आने की जुगत भिड़ा दी है।
