MP BJP Team: मध्य प्रदेश BJP में नई कार्यकारिणी और प्रदेश कार्यसमिति के गठन को लेकर घमासान चरम पर पहुंच गया है। जिसे अब तक लोग राज्यसभा चुनाव के टिकटों से जोड़कर देख रहे थे, उसकी असली कड़वी हकीकत कुछ और ही निकली है। तीन दिन पहले भाजपा प्रदेशाध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के बीच दिल्ली दरबार में हुई हाई-प्रोफाइल मुलाकात को लेकर जो राजनैतिक कयास लगाए जा रहे थे, वे पूरी तरह पलट गए हैं।
हेमंत को क्यों जाना पड़ा दिल्ली?
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस बैठक का मुख्य एजेंडा राज्यसभा चुनाव न होकर पिछले कई महीनों से लटकी प्रदेश बीजेपी की नई प्रदेश कार्यसमिति की घोषणा था। गुटबाजी और नेताओं के दबाव के बीच सूबे की यह नई कार्यसमिति धरातल पर उतरने के बजाय हवा में ही गोते खा रही है, जिसे हरी झंडी दिलाने खुद प्रदेश अध्यक्ष को दिल्ली दौड़ लगानी पड़ी।
कागजों में सिमटी टीम
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल अपनी नई टीम का ऐलान करने के लिए लंबे समय से एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, लेकिन प्रदेश बीजेपी के कई कद्दावर और सीनियर नेताओं ने अपने-अपने समर्थकों को पद दिलाने के लिए अड़ंगेबाजी शुरू कर दी है। खींचतान इस कदर बढ़ चुकी है कि कार्यसमिति में जगह पाने की आस लगाए बैठे कई जमीनी नेताओं की उम्मीदें अब धुंधलाने लगी हैं। जिसका उदहारण भोपाल स्थित प्रदेश भाजपा कार्यालय में साफ देखी जा सकती है, जहां नेताओं की भीड़ न होने के कारण इन दिनों वीरानी छाई हुई है।
बंद कमरे में चली गुप्त वार्ता
राजनैतिक गलियारों में चर्चा है कि दिल्ली में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और हेमंत खंडेलवाल के बीच बंद कमरे में काफी देर तक सीक्रेट मीटिंग चली। प्रदेश अध्यक्ष अपने साथ उन संभावित चेहरों की एक सूची भी लेकर गए थे, जिन्हें वे कार्यसमिति में शामिल करना चाहते हैं। इस गुप्त वार्ता के दौरान दिल्ली हाईकमान के सामने सूबे के एक-एक नाम की कुंडली खोली गई और विचार-विमर्श किया गया।
क्या है खंडेलवाल की रणनीति?
दरअसल, इस पूरी कवायद के पीछे प्रदेश अध्यक्ष की एक सोची-समझी राजनैतिक मजबूरी छिपी है। मध्य प्रदेश के कई सीनियर मंत्रियों और पूर्व मुख्यमंत्रियों ने अपने चहेते कार्यकर्ताओं की लिस्ट प्रदेश अध्यक्ष को थमा रखी है और वे फोन कर-करके लगातार दबाव बना रहे हैं। ऐसी स्थिति में प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के सामने गहरा असमंजस खड़ा हो गया है। वे जानते हैं कि यदि वे खुद सूची जारी करेंगे, तो उन पर किसी एक गुट का पक्ष लेने या भेदभाव करने का आरोप लग जाएगा। इसलिए उन्होंने सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे वाली रणनीति अपनाई है। वे चाहते हैं कि इस सूची पर अंतिम मुहर और काट-छांट का पूरा काम केंद्रीय नेतृत्व खुद अपने हाथों से कर दे। ऐसा होने से प्रदेश के स्थानीय नेता प्रदेश अध्यक्ष से नाराज नहीं हो पाएंगे और सारा ठीकरा दिल्ली के पाले में चला जाएगा।
इस हाई-प्रोफाइल दिल्ली मंथन के बाद अब कयास लगाए जा रहे हैं कि जून के पहले या दूसरे सप्ताह में केंद्रीय हस्तक्षेप के बाद आखिरकार मप्र बीजेपी की नई कार्यसमिति का आधिकारिक ऐलान कर दिया जाएगा।
