मध्य प्रदेश में आने वाले नगरीय निकाय चुनाव से पहले राज्य निर्वाचन आयोग की एक बड़ी कार्रवाई ने कई नेताओं की राजनीतिक मुश्किलें बढ़ा दी हैं. आयोग ने करीब 3500 पूर्व प्रत्याशियों को चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया है. इन सभी पर आरोप है कि इन्होंने 2022 के नगरीय निकाय चुनाव के बाद अपने चुनावी खर्च का पूरा हिसाब तय समय सीमा में जमा नहीं किया.
उम्मीदवार को चुनाव परिणाम घोषित होने के 30 दिनों के भीतर अपने खर्च का विस्तृत ब्यौरा आयोग को देना अनिवार्य
निर्वाचन नियमों के अनुसार हर उम्मीदवार को चुनाव परिणाम घोषित होने के 30 दिनों के भीतर अपने खर्च का विस्तृत ब्यौरा आयोग को देना अनिवार्य होता है. लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे प्रत्याशी सामने आए जिन्होंने या तो खर्च का विवरण जमा ही नहीं किया या फिर अधूरी जानकारी दी. आयोग ने कई बार नोटिस जारी किए और अभ्यर्थियों को अपना पक्ष रखने का मौका भी दिया, लेकिन अधिकांश उम्मीदवार संतोषजनक जवाब नहीं दे सके. इसके बाद आयोग ने सख्त कदम उठाते हुए कई नेताओं पर 2 साल से लेकर 5 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी.
5 साल की लगी है पाबंदी
इस फैसले का सबसे ज्यादा असर अब 2027 में होने वाले नगरीय निकाय और पंचायत चुनावों पर पड़ने वाला है. जिन नेताओं पर पांच साल की पाबंदी लगी है, वे 2031 तक किसी भी चुनाव में हिस्सा नहीं ले पाएंगे. वहीं दो साल के लिए अयोग्य घोषित किए गए नेता भी अगले चुनाव से बाहर हो जाएंगे. ऐसे में जिन नेताओं ने अपने क्षेत्रों में दोबारा सक्रियता बढ़ानी शुरू कर दी थी, उनके लिए यह फैसला बड़ा झटका माना जा रहा है.
पूरी प्रक्रिया को डिजिटल माध्यम से संचालित
राज्य निर्वाचन आयुक्त मनोज श्रीवास्तव ने इस पूरी प्रक्रिया को डिजिटल माध्यम से संचालित कराया. उम्मीदवारों को भोपाल बुलाने की बजाय जिला मुख्यालयों के एनआईसी केंद्रों से ऑनलाइन सुनवाई का अवसर दिया गया. हर गुरुवार को सुनवाई हुई, लेकिन अधिकतर प्रत्याशी अपने चुनावी खर्च से जुड़े दस्तावेज पेश नहीं कर सके. भोपाल में भी इस कार्रवाई का असर साफ दिखाई दिया. यहां 100 डिफॉल्टर उम्मीदवारों की सूची बनाई गई थी. इनमें से केवल 12 उम्मीदवार ही आयोग को संतोषजनक जवाब दे पाए, जबकि बाकी 82 नेताओं को अयोग्य घोषित कर दिया गया. कार्रवाई की जद में कई चर्चित स्थानीय चेहरे भी आए हैं.
क्या बोले निर्वाचन आयोग
निर्वाचन आयोग का कहना है कि इस सख्ती का उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखना और धनबल के प्रभाव को नियंत्रित करना है. आयोग मानता है कि यदि उम्मीदवार खर्च का सही रिकॉर्ड नहीं देंगे तो निष्पक्ष चुनाव कराना मुश्किल हो जाएगा. यही वजह है कि इस बार नियमों के पालन को लेकर किसी तरह की ढील नहीं दी गई. अब इस फैसले की राजनीतिक गलियारों में जमकर चर्चा हो रही है और कई नेताओं की रणनीति बदलती नजर आ रही है.
यह भी पढ़ें- हर महीने 5000 तक पेंशन! जानिए Atal Pension Yojana की पूरी डिटेल, कौन और कैसे कर सकते हैं अपलाई
यह भी पढ़ें- MP में किसानों की बल्ले-बल्ले! भू-अर्जन संशोधन से यूं मिलेगा बंपर फायदा
यह भी पढ़ें- इस देश में टॉयलेट सीट की होती है पूजा, जानें हैरान कर देने वाली कहानी
यह भी पढें- New COVID Variant BA.3.2 Cicada: फिर कोरोना की एंट्री, जानें लक्षण और बचाव के तरीके
