भोपाल/सुनील बंशीवाल/खबर डिजिटल/ मध्यप्रदेश में 15 मार्च से गेहूं की खरीदी शुरु होने वाली है, इसको लेकर सरकार ने तमाम तरह की तैयारियां की है, लेकिन इसी बीच प्रदेश के लगभग 850 राइस मिलर्स नाराज हैं। अपग्रेडेशन राशि न मिलने के कारण, मध्यप्रदेश चावल उद्योग महासंघ से जुड़े कई मिलर्स मिलिंग प्रक्रिया का बहिष्कार कर रहे हैं, जिसके चलते सरकार के सामने नई परेशानी खड़ी हो सकती है।
अपग्रेडेशन राशि को लेकर मिलर्स नाराज
इस साल 20 जनवरी तक सरकारी खरीद में 7.5 लाख किसानों ने करीब 52 लाख मीट्रिक टन धान बेचा है। पिछले साल की तरह इस साल भी सरकार ने धान खरीदने की नीति में कोई अपग्रेडेशन राशि नहीं दी है। इससे मिलर्स काफी नाराज हैं।
नाराजगी की बताई वजह
राइस मिलर्स का कहना है कि जब वे धान को मिलिंग करके एफसीआई को भेजते हैं, तो उसमें 67% चावल जमा करने का नियम है। इसके बाद जो टूटे चावल निकलते हैं, उन्हें 20 रुपए किलो के हिसाब से एथेनॉल प्लांट को बेच दिया जाता हैं। इस नुकसान को पूरा करने के लिए अपग्रेडेशन राशि दी जाती है, जोकि अब तक नहीं दी गई है।
49.93 लाख मीट्रिक टन धान की मिलिंग बाकी
नागरिक आपूर्ति निगम ने बताया कि अभी तक 392 मिलर्स ने 5.5 लाख मीट्रिक टन (एलएमटी) धान की मिलिंग का अनुबंध किया गया है। इनमें से अब तक सिर्फ 2.25 लाख मीट्रिक टन धान की मिलिंग हो पाई है। ये कुल मिलिंग का सिर्फ 4% है। अभी भी 49.93 लाख मीट्रिक टन धान की मिलिंग बाकी है, जोकि एक बड़ा आंकड़ा है।
साल 2025 से बंद की अपग्रेडेशन राशि
जानकारी के मुताबिक कुछ साल पहले सरकार ने मिलर्स को उनकी मशीनों को अपग्रेड करने के लिए पैसे देने की शुरूआत की थी, जोकि सालों तक चलता रहा, लेकिन साल 2025 में इसको बंद कर दिया गया, कैबिनेट की बैठक में भी कोई निर्णय नहीं लिया गया। अब मिलर्स उसी नुकसान पर नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। हालांकि अभी भी मिलिंग पर 10 रूपये और प्रोत्साहन राशि के रूप में 50 रुपए प्रति क्विंटल मिल रहे हैं। मिलर्स के जरिए मुख्य रूप से अनाज (जैसे गेहूं, मक्का या चावल) को पीसा जाता है। इसके बाद उसे आटे या अन्य उपयोगी उत्पादों में बदलते हैं। इस विधि को ही मिलर्स मिलिंग प्रक्रिया कहते हैं।


