मध्य प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से चर्चा में बने हुए बीना विधायक निर्मला सप्रे के दलबदल मामले में अब महत्वपूर्ण मोड़ आ गया है. जबलपुर हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है. इस मामले पर प्रदेश के राजनीतिक दलों, नेताओं और आम जनता की नजरें टिकी हुई हैं क्योंकि इसका असर केवल एक विधायक की सदस्यता तक सीमित नहीं माना जा रहा. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह मामला लोकतांत्रिक व्यवस्था और दल-बदल विरोधी कानून की प्रभावशीलता की भी परीक्षा है. गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने अदालत के सामने अपने-अपने तर्क और दस्तावेज पेश किए. विस्तृत बहस सुनने के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखने का आदेश दिया.
विधानसभा स्तर पर देरी को लेकर कोर्ट ने जताई थी नाराजगी
इस मामले की पिछली सुनवाई में हाई कोर्ट ने विधानसभा में लंबित प्रक्रिया पर असंतोष व्यक्त किया था. अदालत ने पूछा था कि करीब दो वर्षों से मामला लंबित होने के बावजूद अंतिम निर्णय क्यों नहीं लिया गया. उस समय राज्य सरकार की ओर से जानकारी दी गई थी कि विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष आवश्यक प्रक्रिया जारी है और उसी के तहत कार्रवाई की जा रही है.
निर्मला सप्रे के बयान ने बढ़ाई चर्चा
सुनवाई के दौरान सबसे अधिक चर्चा निर्मला सप्रे के उस बयान की रही जिसमें उन्होंने स्वयं को अब भी कांग्रेस का सदस्य बताया. अदालत ने उनके इस बयान को रिकॉर्ड में दर्ज भी किया है. दूसरी तरफ कांग्रेस लगातार यह दावा करती रही है कि लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने भाजपा के समर्थन में सक्रिय भूमिका निभाई और कई सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाजपा नेताओं के साथ मंच साझा किया. कांग्रेस का कहना है कि निर्मला सप्रे ने पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार और संगठन के हितों के विपरीत काम किया. इसी आधार पर उनकी सदस्यता समाप्त करने की मांग लंबे समय से की जा रही है. पार्टी का दावा है कि उनके भाजपा के साथ लगातार बढ़ते संबंधों के पर्याप्त संकेत और प्रमाण मौजूद हैं.
चुनावी जीत से लेकर कोर्ट तक पहुंचा विवाद
निर्मला सप्रे ने वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर बीना सीट से जीत दर्ज की थी. चुनाव के बाद भाजपा नेताओं के साथ उनकी नजदीकियों को लेकर राजनीतिक विवाद शुरू हुआ. नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने विधानसभा अध्यक्ष को शिकायत सौंपकर उनकी सदस्यता रद्द करने की मांग की थी. जब विधानसभा स्तर पर कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ तो मामला हाई कोर्ट पहुंच गया. अब सभी की निगाहें हाई कोर्ट के अंतिम फैसले पर हैं. माना जा रहा है कि यह निर्णय केवल निर्मला सप्रे के राजनीतिक भविष्य को ही प्रभावित नहीं करेगा, बल्कि प्रदेश में दल-बदल से जुड़े मामलों के लिए भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है.
