रीवा/अरविंद तिवारी/खबर डिजिटल/ रीवा जिले के किसान आज फिर उसी पुरानी पीड़ा से जूझ रहे हैं, जो हर सीजन में उनके सामने आ खड़ी होती है। जब खेतों में फसल के लिए खाद की जरूरत होती है, तब किसानों को खाद नहीं मिलती और जब महीनों की मेहनत के बाद गेहूं या धान की फसल तैयार होती है, तब शासकीय खरीदी केंद्रों पर बारदाना (बोरी) न होने का बहाना सामने आ जाता है।
बारदाना, कर्मचारियों की कमी
कई खरीदी केंद्रों पर किसानों को चार-चार, पांच-पांच दिन तक अपनी उपज के साथ रुकने के लिए मजबूर किया जा रहा है। कहीं बारदाना नहीं, तो कहीं तौल करने वाले कर्मचारी ही नदारद हैं। किसान अपनी उपज खुले में रखकर दिन-रात परेशान हो रहे हैं।
किसानों ने सुनाई पीड़ा
किसानों का कहना है कि जब वे फसल बोने से पहले खाद लेने जाते हैं, तो उन्हें लाइन में लगकर घंटों इंतजार करना पड़ता है। कई बार तो हालात ऐसे बन जाते हैं कि महिलाओं तक को खाद के लिए गुहार लगानी पड़ती है। कहीं-कहीं किसानों के साथ अभद्र व्यवहार और डंडा चलने जैसी घटनाएं भी सामने आती हैं।
खाद,बारदाना की कमी के पीछे कारण
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार के पास पहले से ही फसल की अनुमानित पैदावार (आनावारी) का पूरा आंकड़ा होता है, धान और गेहूं की खरीदी के लिए स्लॉट बुकिंग होती है, तो फिर खाद और बारदाना की कमी कैसे हो जाती है? क्या यह प्रशासनिक लापरवाही है या फिर किसानों के साथ कोई बड़ा षड्यंत्र?
जिले के सभी अंचलों के हालात ऐसे ही
जिले के लगभग सभी अंचलों में हालात एक जैसे हैं। किसान यह सोचने को मजबूर है कि वह अपनी समस्या लेकर आखिर जाए तो जाए कहां? जनप्रतिनिधि किसानों के वोट से सत्ता तक तो पहुंच जाते हैं, लेकिन संकट के समय उनसे दूरी बना लेते हैं।
फसल बेचने को भटक रहे किसान
आजादी के 78 साल बाद भी यदि किसान खाद और अपनी फसल बेचने के लिए भटकने को मजबूर है, तो यह व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। सवाल यह भी है कि गलती सरकार की नीति में है या फिर योजनाओं को जमीन पर लागू करने वाले प्रशासनिक तंत्र में?
आर्थिक नुकसान से बचाने की मांग
किसानों की मांग है कि खाद आपूर्ति और खरीदी केंद्रों पर बारदाना व कर्मचारियों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए, ताकि उन्हें बार-बार अपमान और आर्थिक नुकसान न झेलना पड़े। अब देखना यह है कि किसानों की इस वेदना का स्थायी समाधान कब और कैसे होता है।


