सतना/अंकित शर्मा/खबर डिजिटल/ रेलवे स्टेशन पर ट्रेन रुकते ही लाल शर्ट पहने, बाजू पर पीतल का बिल्ला बांधे और “साहब… कुली!” की आवाज लगाते हुए दौड़ते लोग अब भारतीय रेलवे की पुरानी पहचान बनते जा रहे हैं। सतना रेलवे स्टेशन की शान माने जाने वाले कुली समुदाय आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।रेलवे के आधुनिकीकरण और बदलती जीवनशैली ने इन ‘बोझ उठाने वालों’ के सिर का बोझ तो कम कर दिया, लेकिन उनके परिवार चलाने का बोझ कई गुना बढ़ा दिया है। खबर डिजिटल की टीम ने जब सतना स्टेशन पर कुलियों का हाल जाना, तो दर्द छलक कर बाहर आ गया है।
लाल शर्ट, पीतल का बिल्ला और खाली हाथ
दरअसल भारत मे करीब कुल 20 हजार से अधिक लाइसेंस धारी कुली है। इसमे मध्यप्रदेश के सतना जिले में स्टेशन पर 42 कुली है। (जिनमें एक महिला भी शामिल है)इन कुलियों का कहना है कि उनकी रोजी-रोटी का सबसे बड़ा दुश्मन ‘ट्रॉली बैग’ बन गया है।पहले लोग भारी-भरकम अटैची और लोहे के ट्रंक लेकर चलते थे, जिन्हें उठाना मजबूरी थी। लेकिन अब बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक, चक्के लगे ट्रॉली बैग को खुद खींचकर ले जाते हैं। एस्केलेटर (स्वचलित सीढ़ियाँ) और लिफ्ट ने रही-सही कसर पूरी कर दी है। अब यात्री को कुली की जरूरत महसूस ही नहीं होती।
100-200 रुपये में कैसे चलेगा घर?
आर्थिक तंगी का आलम यह है कि जो कुली पहले प्रतिदिन 500 से 700 रुपये कमा लेते थे, आज वे दिन भर मेहनत करके बमुश्किल 100 से 200 रुपये ही घर ले जा पाते हैं।रेलवे ने 40 किलो वजन उठाने का रेट 60 रुपये तय कर रखा है। लेकिन समस्या रेट की नहीं, काम मिलने की है। सतना में अधिकांश ट्रेनें प्लेटफॉर्म नंबर 1 पर आती हैं। यहाँ से बाहर निकलने के दो रास्ते हैं और दूरी बहुत कम है। यात्री ट्रेन से उतरते हैं और खुद सामान खींचते हुए मिनटों में बाहर निकल जाते हैं।
‘सुविधाएं बढ़ीं, हमारा रोजगार घटा’
15 साल से सतना स्टेशन पर काम कर रहे कुली चंदन यादव ने खबर डिजिटल से बातचीत के दौरान बताया कि हमारे देखते-देखते रेलवे बदल गया। स्टेशन पर टाइल्स लग गईं, लिफ्ट लग गई, एस्केलेटर आ गए। यात्रियों के लिए यह विकास है, लेकिन हमारे लिए विनाश। अब इस काम में जान नहीं बची। दिन भर ताकते रहते हैं, बमुश्किल कुछ सवारियां ही मिलती हैं। परिवार चलाना मुश्किल हो गया है।”
रेलवे यात्रियों पर ध्यान दे रहा लेकिन…
एक अन्य कुली उमेश कुमार शर्मा ने खबर डिजिटल से बातचीत के दौरान बताया की निजीकरण और बैटरी कार जैसी सुविधाओं ने हमें बेकार कर दिया है। रेलवे हर तरफ यात्रियों की सुविधाएं बढ़ा रहा है, जो अच्छी बात है, लेकिन उसने हमारे पेट पर लात मार दी है। अब हमारे लायक कोई काम ही नहीं बचा।
लालू यादव के दौर की याद और बजट से उम्मीद
कुलियों को आज भी पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव का कार्यकाल याद आता है। कुली चंदन यादव बताते हैं कि 2008 में लालू जी ने कुलियों को ‘गैंगमैन’ बनाकर ग्रुप-डी में नौकरी दी थी। सतना के कुली अब केंद्र सरकार और आने वाले बजट से आस लगाए बैठे हैं। उनकी मांग है कि रेलवे प्रशासन उनकी सुध ले और उन्हें भी ग्रुप-डी कर्मचारी का दर्जा दे, ताकि वे सम्मान के साथ अपना जीवन यापन कर सकें।
नई पीढ़ी ने मोड़ा मुंह
हालात इतने खराब हैं कि अब कुलियों के बच्चे इस पेशे में नहीं आना चाहते। कमाई न होने के कारण कई कुली यह काम छोड़ने का मन बना रहे हैं, लेकिन उम्र और कोई दूसरा हुनर न होने के कारण वे इसी प्लेटफॉर्म पर घिसटने को मजबूर हैं।


