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Asaram Son Divorce: आसाराम के बेटे नारायण साई का तलाक फाइनल, एलिमनी में देने होंगे 2 करोड़

इंदौर से सामने आए एक चर्चित मामले में अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए स्वयंभू संत आसाराम के बेटे नारायण साई और उनकी पत्नी के बीच लंबे समय से चल रहे विवाद को खत्म कर दिया है. इंदौर की फैमिली कोर्ट ने दोनों के विवाह को समाप्त करते हुए तलाक की मंजूरी दे दी है. इसके साथ ही अदालत ने नारायण साई को अपनी पत्नी को भारी-भरकम गुजारा भत्ता देने का आदेश भी दिया है.

आसाराम के बेटे का हुआ तलाक

मिली जानकारी के अनुसार, कोर्ट ने नारायण साई को उनकी पत्नी जानकी देवी को स्थायी भरण-पोषण (एलिमनी) के रूप में 2 करोड़ रुपये देने का निर्देश दिया है. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह रकम तय समय सीमा के भीतर अदा करनी होगी. यह मामला काफी समय से अदालत में लंबित था. जानकी हरपालानी ने वर्ष 2018 में इंदौर फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की थी. उन्होंने अपने पति पर मानसिक उत्पीड़न जैसे आरोप लगाते हुए अलग होने की मांग की थी और साथ ही 5 करोड़ रुपये के गुजारा भत्ते की मांग भी की थी.

इतनी मिली एलिमिनी

सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की दलीलें सुनी गईं और सबूतों के आधार पर अदालत ने फैसला सुनाया. हालांकि पत्नी ने 5 करोड़ रुपये की मांग की थी, लेकिन कोर्ट ने परिस्थितियों को देखते हुए 2 करोड़ रुपये की राशि तय की. इस मामले की एक खास बात यह भी रही कि पहले कोर्ट ने अंतरिम तौर पर नारायण साई को हर महीने 50 हजार रुपये भरण-पोषण देने का आदेश दिया था, लेकिन आरोप है कि उन्होंने कई वर्षों तक यह राशि भी नहीं दी.

कब टूटा रिश्ता

बताया जा रहा है कि नारायण साई फिलहाल गुजरात के सूरत जिले की जेल में बंद हैं, जहां वह एक दुष्कर्म मामले में सजा काट रहे हैं. ऐसे में इस केस की सुनवाई के दौरान उन्हें सुरक्षा के बीच अदालत में पेश भी किया गया था. जानकारी के मुताबिक, नारायण साई और जानकी की शादी साल 2008 में हुई थी और करीब 18 साल बाद अब इस रिश्ते का अंत हो गया है. दोनों के बीच पिछले कई वर्षों से विवाद चल रहा था और वे अलग-अलग रह रहे थे. इस दंपती की कोई संतान भी नहीं है. अदालत ने अपने फैसले में यह माना कि दोनों के बीच संबंध पूरी तरह टूट चुके हैं और अब इस विवाह को बनाए रखना संभव नहीं है. ऐसे में तलाक ही उचित विकल्प है. साथ ही, पत्नी के भविष्य को ध्यान में रखते हुए एकमुश्त बड़ी राशि देने का आदेश दिया गया, ताकि उन्हें आगे आर्थिक दिक्कतों का सामना न करना पड़े.

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