डिंडौरी/शैलेश नामदेव/खबर डिजिटल/ आदिवासी बहुल डिंडोरी जिले में शिक्षा व्यवस्था की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। कहीं शिक्षक नहीं, कहीं भवन नहीं, तो कहीं शिक्षक खुद शराब के नशे में स्कूल पहुंच रहे हैं। ऐसे में शिक्षा का भार जिन लोगों के कंधों पर है, वही कभी-कभी सिस्टम की मार झेलते-झेलते जीवन की जंग लड़ने को मजबूर हो जाते हैं। ऐसा ही दर्दनाक मामला सामने आया है, जिसने पूरे जिले के प्रशासनिक ढांचे पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।
14 साल से निलंबन पर सुनवाई नहीं, न भत्ता मिला, न न्याय
करंजिया विकासखंड के कुतरी ग्राम के प्राथमिक स्कूल में पदस्थ शिक्षक धनीराम मरावी को वर्ष 2011 की जनगणना के दौरान लापरवाही के आरोप में तत्कालीन कलेक्टर ने निलंबित कर दिया था। नियमों के मुताबिक निलंबन अवधि में मिलने वाला जीवन निर्वाह भत्ता कुछ महीनों तक मिला, फिर अचानक बंद हो गया। इसके बाद 14 वर्ष बीत गए, लेकिन न सुनवाई हुई, न जांच आगे बढ़ी, और न ही भत्ता दोबारा जारी हुआ। धनीराम की हालात इतने बदतर हो गए कि परिवार का पेट भरने के लिए उन्हें जंगल से लकड़ी काटकर बाजार में बेचनी पड़ रही है।
बीमार पत्नी, बच्चों की शादी
एक शिक्षक, जो कभी बच्चों को भविष्य का रास्ता दिखाता था, आज अपनी ही किस्मत की लड़ाई लड़ने को मजबूर है। धनीराम की पत्नी गंभीर रूप से बीमार है, इलाज के लिए पैसे नहीं। बच्चों की शादी, घर खर्च-हर जिम्मेदारी सिर पर है, पर आमदनी सिर्फ जंगल से काटी गई लकड़ियों की बिक्री से होने वाली मामूली रकम। धनीराम बताते हैं कि “एक गलती की इतनी बड़ी सज़ा मिलेगी, सोचा नहीं था। सिस्टम की बेरुखी ने हमें तोड़ दिया है। आज हालात ऐसे हैं कि अपने ही बच्चों का पेट भरने के लिए मजदूरी करनी पड़ रही है।” साथी शिक्षकों का दर्द—‘भविष्य संवारने वाला आज खुद टूटा है। धनीराम के साथी शिक्षक बताते हैं कि वह पहले बेहद लगन से स्कूल चलाते थे, बच्चों के भविष्य की चिंता करते थे। लेकिन विभागीय लापरवाही और वर्षों तक सुनवाई न होने के कारण वह पूरी तरह टूट गए।
14 साल से सवाल
पूरा गांव स्तब्ध है कि इतने वर्षों तक एक शिक्षक की पीड़ा पर किसी ने ध्यान क्यों नहीं दिया? क्या सिस्टम की खामोशी एक परिवार को बर्बाद करने का कारण बन सकती है?
क्या 14 साल तक फाइलें धूल खाती रहीं, और कोई देखने वाला नहीं था?
कलेक्टर का आश्वासन
मामले की जानकारी मिलने के बाद कलेक्टर अंजू पवन भदौरिया ने बताया कि “निलंबन अवधि का जीवन निर्वाह भत्ता प्रदान किया जाएगा और नियमानुसार बहाली की कार्रवाई की जाएगी।” ग्रामीणों को उम्मीद है कि अब शायद 14 साल से अटकी धनीराम की जिंदगी फिर से पटरी पर लौट सकेगी।


