स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर एक बड़ा फैसला लिया गया है, जिसने आयुष्मान योजना से जुड़े लाखों लोगों की चिंता बढ़ा दी है. सरकार समय-समय पर योजनाओं में बदलाव करती रहती है ताकि सुविधाओं की गुणवत्ता बेहतर हो सके, लेकिन इस बार लिया गया निर्णय सीधे तौर पर मरीजों और अस्पतालों दोनों को प्रभावित करने वाला माना जा रहा है. खासतौर पर उन लोगों के लिए यह खबर अहम है, जो अब तक आयुष्मान योजना के तहत मुफ्त इलाज पर निर्भर थे.
कई अस्पतालों से आयुष्मान कार्ड की हुई छुट्टी
दरअसल 1 अप्रैल 2026 से लागू नई व्यवस्था के तहत प्रदेश के 126 निजी अस्पतालों को आयुष्मान योजना से बाहर कर दिया गया है. इसका मतलब साफ है कि अब इन अस्पतालों में आयुष्मान कार्ड के जरिए मुफ्त इलाज की सुविधा नहीं मिलेगी. यह फैसला अचानक नहीं लिया गया, बल्कि इसके पीछे स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को लेकर लंबे समय से चल रही चिंता बताई जा रही है. जानकारी के मुताबिक पहले राज्य में करीब 398 निजी अस्पताल इस योजना से जुड़े हुए थे. इनमें से बड़ी संख्या में अस्पताल तय मानकों पर खरे नहीं उतर पा रहे थे. इसी वजह से सरकार ने सख्त कदम उठाते हुए ऐसे अस्पतालों की मान्यता समाप्त कर दी. सबसे ज्यादा असर भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे बड़े शहरों में देखने को मिला है.
इन शहरों में इतने अस्पताल से आउट
अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो भोपाल में 51, इंदौर में 30, ग्वालियर में 33 और जबलपुर में 12 अस्पताल इस फैसले से प्रभावित हुए हैं. यह संख्या बताती है कि कार्रवाई छोटे स्तर पर नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर की गई है. इससे साफ संकेत मिलता है कि सरकार अब स्वास्थ्य सेवाओं में किसी तरह की लापरवाही बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है. इस फैसले की सबसे बड़ी वजह NABH यानी नेशनल एक्रिडिटेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स का सर्टिफिकेट है. नए नियमों के तहत अब वही अस्पताल आयुष्मान योजना के तहत मरीजों का इलाज कर पाएंगे, जिनके पास यह प्रमाणपत्र होगा. जिन अस्पतालों के पास यह सर्टिफिकेट नहीं था, उन्हें तुरंत योजना से बाहर कर दिया गया. हालांकि जिनके पास एंट्री लेवल सर्टिफिकेट है, उन्हें अपने स्तर को सुधारने के लिए कुछ समय दिया गया है.
सरकार का कहना है कि इस कदम का मकसद मरीजों को बेहतर और सुरक्षित इलाज उपलब्ध कराना है. NABH सर्टिफिकेट वाले अस्पतालों में इलाज की गुणवत्ता, साफ-सफाई और सुरक्षा मानकों का खास ध्यान रखा जाता है. ऐसे में योजना में केवल उन्हीं अस्पतालों को शामिल रखना, जो इन मानकों पर खरे उतरते हों, जरूरी माना गया है. हालांकि इस फैसले का असर आम लोगों पर पड़ सकता है. खासकर गरीब और मध्यम वर्ग के मरीज, जो छोटे निजी अस्पतालों पर निर्भर थे, उन्हें अब दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. बड़े अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ने से इलाज में देरी और भीड़ जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं.
यह भी पढ़ें-इस देश में टॉयलेट सीट की होती है पूजा, जानें हैरान कर देने वाली कहानी
यह भी पढें-New COVID Variant BA.3.2 Cicada: फिर कोरोना की एंट्री, जानें लक्षण और बचाव के तरीके
यह भी पढें-MP Pension Scheme: 55 लाख लोगों की बल्ले-बल्ले! सरकार ने ट्रांसफर किए करोड़ों रुपये, चेक करें अपना नाम
यह भी पढ़ें-MP में बिजली ने रुलाया, हुई इतनी महंगी, 1 अप्रैल से लगेगा झटका


