भोपाल/सुनील बंशीवाल/खबर डिजिटल/ मध्यप्रदेश के मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड आ गया है, ये उनके विभाग के कामकाज को लेकर नहीं है, बल्कि उनके प्रभार वाले जिलों के कामकाज को लेकर रिपार्ट कार्ड जारी किया गया है, इससे साबित होता है कि अनुभवों का भरमार वाले मंत्रिमंडल में किस तरह से अपने प्रभार वाले जिलों को दरकिनार किया गया है, क्योंकि सीएम डॉ. मोहन यादव की मंशानुसार कई मंत्रियों ने कामकाज नहीं किया, रात में रुकने वाली परंपरा को भी सिरे से दरकिनार किया गया, जबकि स्पष्ट निर्देश थे कि वो अपने प्रभार वाले जिले में रुककर विकास की गति को तेज करने का काम करें।
खुलेआम बैठकों को किया जा रहा दरकिनार
पुरानी कैबिनेट की बैठकों को आंकड़ों पर गौर करें तो मोहन कैबिनेट के कई मंत्री शामिल नहीं हुए, वो खुलेआम बैठक का बहिष्कार करते देखे गए, जबकि यह परंपरा पार्टी विद डिफरेंस कहलानी वाली बीजेपी में पहले नहीं देखी गई, इसी तरह प्रभारी जिलों में भी मंत्रियों की रुचि काफी कम ही दिखाई दी, जिसके चलते उनकी भूमिका के चलते कामकाज प्रभावित हो रहा है, पार्टी के कार्यकर्ता भी आस लगाए बैठे थे कि उनके प्रभारी मंत्री जिलों में आए, और उनकी समस्याओं को हल करने का काम करें, लेकिन अब उन्हें मंत्री जी से मिलने के लिए पार्टी के प्रदेश स्तरीय दफ्तर का रुख करना पड़ रहा है।
प्रभारी मंत्रियों को किया गया था निर्देशित
बता दें कि पुरानी परंपरा के अनुसार अगस्त 2024 को मोहन यादव सरकार के मंत्रियों को जिलों का प्रभार दिया गया था, उस समय यह कहा गया था कि प्रभारी मंत्री अपने प्रभार वाले जिलों का न केवल दौरा करेंगे, बल्कि रात रुकेंगे और स्थानीय स्तर पर बैठकें भी लेंगे, लेकिन पिछले डेढ़ साल की तफ्तीश से पता चला कि कई दिग्गज मंत्रियों ने न तो बैठकें ली, न रात रुकने में रुचि दिखाई। इसी तफ्तीश को मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड का नाम दिया गया है। एक सर्वे के मुताबिक कुछ मंत्री तो ऐसे हैं जो 18 महीनों में दस बार भी प्रभार के जिलों में नहीं गए, इसी के आधार पर पार्टी आलाकमान को जानकारी देकर मंत्रिमंडल विस्तार को नए सिरे से या फिर गुजरात की तर्ज पर सभी मंत्रियों से इस्तीफा लेकर नए गठन की कवायद की जा सकती है।
ये है प्रभारी मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड
जिलों से आई रिपोर्ट के आधार पर जानकारी मिली है कि उप मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा जबलपुर जैसे प्रभार वाले जिले में सिर्फ दो रात रुके और एक बैठक ली। दूसरे डिप्टी राजेंद्र शुक्ला भी शहडोल में सिर्फ दो रात रुके और दो बैठकें लीं। मोहन सरकार को लगातार परेशानी में डालने वाले नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय धार में रात रुके ही नहीं, लोनिवि मंत्री राकेश सिंह ने नर्मदापुरम की अभी तक कोई बैठक नहीं ली, मुख्यमंत्री पद के दावेदार मंत्री प्रहलाद पटेल भिंड में सिर्फ दो रात रुके। इसी तरह सीएम डॉ. मोहन यादव के निर्देशों को दरकिनार करते हुए मंत्री राकेश सिंह, विश्वास सारंग और राकेश शुक्ला ने एक भी बैठक प्रभारी जिले में नहीं ली।
बाकी की रिपोर्ट भी ये रही
मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, राकेश शुक्ला, कृष्णा गौर व चैतन्य काश्यप ने अपने प्रभार वाले जिले में एक रात रुकना भी गवारा नहीं किया, नतीजतन आने वाले वक्त में प्रहलाद सिंह पटेल और कैलाश विजयवर्गीय के साथ ही विश्वास सारंग, प्रतिमा बागरी, दिलीप अहिरवार, इंदर परमार, नरेंद्र शिवाजी पटेल, धर्मेंद्र लोधी, विजय शाह, एदल सिंह कंषाना, नागर सिंह चौहान, और कृष्णा गौर के बारे में पार्टी आलाकमान पुनर्विचार की मुद्रा में आ सकता है, क्योंकि प्रभारी मंत्रियों की निष्क्रियता के चलते जिलों के अधिकारी उनकी ही पार्टी के विधायकों की नहीं सुनते, जिसका नतीजा सत्ताधारी दलों के विधायकों का खुलेतौर पर विरोध देखा जा रहा है।
दिग्विजय सिंह ने शुरु की थी परंपरा
बता दें कि प्रशासन के विकेंद्रीकरण के उद्देश्य से 1993 में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने प्रभारी मंत्री, प्रभारी सचिव का सेट अप बनाया था, और उसके बेहतर परिणाम भी मिले थे, लेकिन मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के मंत्रियों ने इस प्रणाली को नाकाम कर दिया, जिसके चलते पार्टी संगठन के माथे पर चिंता की लकीरें आना लाजिमी है।


