खबर डिजिटल/भोपाल। मध्य प्रदेश के शहरी निकायों को आत्मनिर्भर बनाने की सरकारी कोशिशों को तगड़ा झटका लगा है। ताजा वित्तीय आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश के पांच सबसे बड़े नगर निगमों में से केवल उज्जैन ही अपने राजस्व संग्रह में बढ़ोतरी दर्ज कर पाया है। इंदौर और भोपाल जैसे महानगरों में भी वसूली के आंकड़े पिछले साल के मुकाबले नीचे गिर गए हैं।
बड़े निगमों का गिरता ग्राफ
25 मार्च 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक, राजधानी भोपाल की वसूली 586 करोड़ से घटकर 573 करोड़ रुपये रह गई है। स्वच्छता में नंबर वन इंदौर भी पीछे रहा, जहां संग्रह 861 करोड़ से कम होकर 856 करोड़ पर आ गया। इसी तरह जबलपुर (233 करोड़) और ग्वालियर (152 करोड़) के राजस्व में भी गिरावट देखी गई। इसके विपरीत, उज्जैन ने शानदार प्रदर्शन करते हुए अपनी वसूली को 57 करोड़ से बढ़ाकर सीधा 131 करोड़ पहुंचा दिया।
छोटे शहरों की रफ्तार तेज
आंकड़े बताते हैं कि जहां 16 बड़े नगर निगम पिछले साल की तुलना में केवल 93% लक्ष्य ही पूरा कर पाए, वहीं नगर परिषदों ने 5% की वृद्धि दर्ज की है। रीवा, देवास, कटनी और सतना जैसे शहरों ने वसूली में सुधार दिखाया है। प्रदेश के नगर निगमों का कुल कलेक्शन 2400 करोड़ से घटकर 2234 करोड़ रुपये रह गया है।
वाटर टैक्स और प्रॉपर्टी टैक्स में चुनौतियां
सरकार ने राजस्व बढ़ाने के लिए जीआईएस (GIS) टैगिंग और करों में वृद्धि जैसे कड़े कदम उठाए थे, लेकिन बड़े शहरों में इनका असर सीमित रहा। सबसे ज्यादा गिरावट वाटर टैक्स में देखी गई है। भोपाल में प्रॉपर्टी टैक्स भी 293 करोड़ से घटकर 253 करोड़ रुपये पर सिमट गया है। हालांकि, अधिकारियों को उम्मीद है कि मार्च के अंतिम दिनों में आंकड़ों में कुछ सुधार हो सकता है।


