डिंडौरी/शैलेश नामदेव/खबर डिजिटल/ आदिवासी कन्या आश्रमों और छात्रावासों में बिना किसी सरकारी आदेश, बिना बिल और बिना भौतिक सत्यापन के चादर, तकिया और कम्बलों की सप्लाई किए जाने का मामला अब गंभीर विवाद का रूप ले चुका है। सप्लाई पहुंचने की जानकारी न तो अधीक्षकों को है, और न ही संबंधित BEO को, जिससे पूरा विभाग शक के घेरे में आ गया है।
घटिया गुणवत्ता की सामग्री, लेकिन मंजूरी किसकी?
स्थानीय सूत्रों के अनुसार छात्रावासों में जो सामग्री पहुंची है, वह अत्यंत निम्न गुणवत्ता की बताई जा रही है। पतले कम्बल, हल्की चादरें और कम दर्जे के तकिए आदिवासी बच्चों के लिए भेजे जाने पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। विभाग की ओर से किसी भी तरह का ऑर्डर न जारी होने और न ही स्टॉक रजिस्टर में प्रविष्टि होने से सप्लाई का स्रोत संदिग्ध माना जा रहा है।
अभिभावकों और सामाजिक संगठनों ने की जांच की मांग
मामले के उजागर होते ही अभिभावकों एवं सामाजिक संगठनों में आक्रोश है। उनका कहना है कि सरकार आदिवासी बच्चों के लिए हर वर्ष बजट जारी करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर न तो गुणवत्ता मिल रही है और न ही पारदर्शिता।
क्या कहते हैं नियम ?
आदिवासी छात्रावासों में सामग्री की खरीद, वितरण और सत्यापन को लेकर स्पष्ट नियम हैं—
- MP वित्तीय नियम (Financial Rules) — अध्याय 7
किसी भी सामग्री की खरीद स्वीकृत प्रक्रिया के तहत ही की जा सकती है।
बिना आदेश (Work/Purchase Order) के सप्लाई स्वीकार करना अनियमितता मानी जाती है।
वस्तुओं की गुणवत्ता जांच (Quality Verification) अनिवार्य है।
- आदिम जाति कल्याण विभाग के छात्रावास संचालन दिशा-निर्देश
सामग्री की सप्लाई केवल विभागीय टेंडर प्रक्रिया से स्वीकृत आपूर्तिकर्ता द्वारा ही की जा सकती है।
अधीक्षक और BEO को सप्लाई की पूर्व सूचना देना अनिवार्य है।
सप्लाई के बाद स्टॉक रजिस्टर में प्रविष्टि और भौतिक सत्यापन (Physical Verification) आवश्यक है।
बिना बिल (GST Invoice) के आई सामग्री को स्वीकार करना नियम विरुद्ध है।


