भोपाल/सुनील बंशीवाल/खबर डिजिटल/ मध्यप्रदेश की राजनीति इन दिनों कुर्सी खींचतान का अखाड़ा बनती जा रही है। सत्ता के गलियारों में विकास और जनता की समस्याओं से ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि किसे मंत्री बनाया जाएगा और किसे नहीं। मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व वाली सरकार में भी अंदरखाने खींचतान की खबरें लगातार सामने आती रहती हैं।
सिंधिया का प्रभाव
सबसे ज्यादा चर्चा केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रभाव और उनके समर्थकों को मंत्रिमंडल में जगह दिलाने को लेकर होती रही है। बताया जाता है कि कई बार मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान उनके समर्थक नेताओं के नाम आगे बढ़े, लेकिन पार्टी के अंदर दूसरे खेमों की नाराज़गी भी खुलकर सामने आई। वहीं कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और वरिष्ठ नेता गोपाल भार्गव जैसे नेताओं का भी अपना अलग राजनीतिक प्रभाव है। प्रदेश की राजनीति में कई बार ऐसा माहौल बन जाता है कि अलग-अलग खेमों के नेता अपनी ताकत दिखाने में लगे रहते हैं।
किसान की बात
इन सबके बीच सवाल यह उठता है कि आखिर जनता के मुद्दों पर कौन ध्यान दे रहा है। किसान आज भी अपनी फसल के सही दाम के लिए संघर्ष कर रहा है, युवा रोजगार की तलाश में भटक रहा है और आम आदमी महंगाई से परेशान है। लेकिन सत्ता के केंद्र में बैठी राजनीति में इन मुद्दों की चर्चा उतनी नहीं होती जितनी पद और कुर्सी की होती है।
सियासत का पैमाना
मध्यप्रदेश की राजनीति का यह सच किसी से छिपा नहीं है कि सत्ता की कुर्सी के लिए नेताओं के बीच अंदरखाने प्रतिस्पर्धा चलती रहती है। लेकिन जनता चाहती है कि नेता आपसी खींचतान छोड़कर प्रदेश के विकास पर ध्यान दें। क्योंकि लोकतंत्र में असली ताकत कुर्सी नहीं, बल्कि जनता का भरोसा होता है।


