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पत्रकारिता के ‘स्वघोषित मसीहा’ या सेंसरशिप की साजिश? 11 चेहरों की ‘गाइडलाइन’ पर उठे गंभीर सवाल

सौरभ श्रीवास्तव संवाददाता कटनी— शहर के पत्रकारिता जगत में इन दिनों एक अजीबोगरीब तमाशा देखने को मिल रहा है। जहाँ एक ओर संविधान ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ देता है, वहीं कटनी में 11 लोगों की एक स्वघोषित टोली बनाई जा रही। जो खुद को ‘पत्रकारिता का सर्टिफिकेट’ बांटने वाली अथॉरिटी मान बैठी है। ताज्जुब की बात यह है कि जो लोग आज दूसरों की योग्यता तय कर रहे हैं, उनकी अपनी पेशेवर डिग्री और नियुक्ति पत्रों का कोई अता-पता नहीं है। साथ ही दूसरों को पत्रकार मानने या ना मानने का अधिकार किस संविधान के तहत इन्हें मिल गया, यह भी सवाल है।*खुद की डिग्री गायब, दूसरों का लेंगे इम्तिहान?*विश्वस्त सूत्रों और गलियारों में चर्चा है कि इन 11 ‘महारथियों’ में से आधे से ज्यादा के पास किसी भी प्रतिष्ठित संस्थान का आधिकारिक नियुक्ति पत्र (Appointment Letter) तक नहीं है। न ही पत्रकारिता की बेसिक डिग्री है। सवाल यह उठता है कि जिस व्यक्ति को खुद उसके संस्थान ने आधिकारिक तौर पर स्वीकार नहीं किया, वह पूरी पत्रकारिता बिरादरी के लिए ‘गाइडलाइन’ तय करने का नैतिक अधिकार कहाँ से लाता है?*संविधान बनाम ‘चंद लोगों’ की तानाशाही*भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 (Article 19) हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार देता है। राज्य और केंद्र सरकार ने आज तक पत्रकारों के लिए ऐसी कोई संकीर्ण नियमावली तय नहीं की है, जैसी कटनी के ये ‘स्वयंभू रक्षक’ थोपना चाहते हैं। यह सीधे तौर पर चौथे स्तंभ को पाबंदियों की बेड़ियों में जकड़ने की कोशिश नजर आती है।*पुलिस वेरिफिकेशन: कटनी बनेगा ‘अनोखा’ जिला?*पूरे हिंदुस्तान में पत्रकार संगठन ‘पुलिस वेरिफिकेशन’ जैसी शर्तों का विरोध करते आए हैं क्योंकि इसे प्रेस की आजादी पर प्रशासनिक अंकुश माना जाता है। लेकिन कटनी शायद देश का पहला ऐसा जिला बनने की राह पर है, जहाँ पत्रकार कहलाने वाले कुछ तथाकथित लोग खुद ही ‘पुलिस जांच’ की मांग कर रहे हैं।* *विद्वानों का मत*: क्या यह सक्रिय पत्रकारों को डराने और उन्हें प्रशासन के दबाव में लाने की एक गहरी साजिश है?* *चर्चा:* क्या ये महारथी चाहते हैं कि पत्रकारिता अब कलम से नहीं, बल्कि पुलिस की रिपोर्ट से तय हो?*कौन देगा ‘असली’ होने का प्रमाण?*जब केंद्र और राज्य सरकारों ने कोई मापदंड तय नहीं किए हैं, तो इन 11 लोगों को यह ‘पावर’ किसने दी कि वे कटनी की पत्रकारिता की दिशा तय करें? सक्रिय पत्रकारों के बीच भारी रोष है कि जो खुद मुख्यधारा से कटे हुए हैं और जिनके पास अपनी पहचान के पुख्ता दस्तावेज नहीं हैं, वे अब ‘पत्रकारिता के मसीहा’ बनकर दूसरों के करियर पर फैसला सुनाना चाहते हैं।

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